चौदह पारियों में हजार टेस्ट रन। और कम-से-कम चौदह बार रिहैब।
दोनों आंकड़े एक ही आदमी के हैं।
पहला आंकड़ा क्रिकेट की किताबों में दर्ज है।
दूसरा खुद विनोद कांबली और उनके करीबियों के बयानों से सामने आया।
एक समय भारतीय क्रिकेट का यह चमकता सितारा अपनी बल्लेबाजी से दुनिया को चौंका रहा था। आज वही विनोद कांबली अपनी सेहत और रिकवरी के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
लेकिन उनकी कहानी को केवल “एक महान प्रतिभा का पतन” कह देना शायद उनके साथ न्याय नहीं होगा।
क्योंकि उनकी कहानी में रिकॉर्ड हैं, रिश्ते हैं, टूटन है, नशे से संघर्ष है, बीमारी है, परिवार है, दोस्ती है—और सबसे बढ़कर है बार-बार वापस लौटने की कोशिश।
27 सितंबर 2026: ठाणे से आया एक वीडियो
पिछले दिनों ठाणे के Nidan Centre for Elderly Care से विनोद कांबली का एक वीडियो सामने आया।
कैमरे के सामने वह अपना नाम बताते हैं। बोलने में उन्हें परेशानी होती दिखाई देती है। शब्दों के बीच रुकते हैं। फिर कहते हैं कि उन्हें वहां बहुत प्यार मिल रहा है, साफ-सफाई अच्छी है और उन्हें ऐसा नहीं लगता कि वह अपने घर से दूर हैं। वीडियो के अंत में वह अपने इलाज और वहां रहने के बारे में बात करते दिखाई देते हैं।
वीडियो सोशल मीडिया पर पहुंचा तो कई तरह की बातें शुरू हो गईं।
किसी ने इसे देखकर चिंता जताई।
किसी ने लिखा कि कांबली को परिवार ने छोड़ दिया।
लेकिन उपलब्ध रिपोर्टों में ऐसी बात की पुष्टि नहीं मिलती। इसके उलट, उनकी पत्नी, भाई और क्रिकेट जगत से जुड़े लोगों की ओर से उनके साथ रहने और मदद करने की बातें सामने आती रही हैं।
और शायद यही इस कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।
बीमारी दिखाई दे सकती है, लेकिन किसी इंसान की पूरी कहानी एक वायरल वीडियो से तय नहीं की जा सकती।
निदान—एक शब्द, जो पूरी कहानी समझा देता है
जिस जगह से यह वीडियो आया, उसका नाम है—निदान।
भारतीय चिकित्सा परंपरा में निदान का अर्थ है बीमारी की पहचान करना, उसकी जड़ तक पहुंचना।
और विनोद कांबली की कहानी में यही शब्द बहुत मायने रखता है।
क्योंकि बीमारी का नाम पता चलना अंत नहीं होता।
वह इलाज की शुरुआत होती है।
कांजुरमार्ग की चाल से शिवाजी पार्क तक
मुंबई के कांजुरमार्ग की एक साधारण चाल।
पिता गणपत कांबली मैकेनिक थे।
घर बहुत साधारण था, लेकिन बेटे का सपना साधारण नहीं था।
किट लेकर भीड़भरी लोकल ट्रेन से वह शिवाजी पार्क पहुंचते थे।
वहीं क्रिकेट के महान कोच रमाकांत आचरेकर बच्चों को क्रिकेट सिखाते थे।
और उसी मैदान पर एक और लड़का आता था—
सचिन तेंदुलकर।
दोनों साथ बड़े हुए।
दोनों ने साथ क्रिकेट सीखा।
और फिर 1988 में स्कूल क्रिकेट के एक मैच में दोनों ने मिलकर 664 रनों की नाबाद साझेदारी की। कांबली ने 349 रन बनाए और तेंदुलकर 326 पर नाबाद रहे।
उस दिन दुनिया ने पहली बार इन दो नामों को एक साथ बड़े अक्षरों में पढ़ा था।
सचिन तेंदुलकर और विनोद कांबली।
दो दोस्त।
दो प्रतिभाएं।
दो सपने।
लेकिन आगे चलकर दोनों की यात्राएं बिल्कुल अलग दिशाओं में चली गईं।
एक ऐसा बल्लेबाज, जिसकी शुरुआत ही रिकॉर्ड से हुई
कांबली ने भारतीय क्रिकेट में कदम रखा तो उनकी बल्लेबाजी ने तुरंत सबका ध्यान खींचा।
उन्होंने टेस्ट क्रिकेट में अपने शुरुआती दौर में लगातार बड़ी पारियां खेलीं।
इंग्लैंड के खिलाफ मुंबई में उन्होंने 224 रन बनाए और इसके बाद जिम्बाब्वे के खिलाफ दिल्ली में 227 रन की पारी खेली। वह टेस्ट क्रिकेट में सिर्फ 14 पारियों में 1,000 रन तक पहुंचने वाले सबसे तेज भारतीय बल्लेबाज बने—यह रिकॉर्ड आज भी उनके नाम से जुड़ा है।
कभी-कभी प्रतिभा इतनी तेज चमकती है कि लोगों को लगता है—
यह लड़का बहुत दूर जाएगा।
कांबली के बारे में भी यही कहा गया।
लेकिन क्रिकेट में शुरुआत और मंजिल के बीच बहुत लंबा रास्ता होता है।
वानखेड़े पर दुनिया ने पीठ थपथपाई
वानखेड़े स्टेडियम में दोहरा शतक।
बड़े क्रिकेटर सामने।
इंग्लैंड के महान बल्लेबाज ग्राहम गूच और माइक गैटिंग जैसे खिलाड़ी उनकी बल्लेबाजी से प्रभावित होकर उनसे मिले।
एक साधारण पृष्ठभूमि से आया युवा खिलाड़ी उस समय दुनिया के बड़े क्रिकेट नामों के बीच खड़ा था।
यह वह दौर था जब लगता था कि भारतीय क्रिकेट को एक और महान बल्लेबाज मिल गया है।
लेकिन क्रिकेट का मैदान जितनी तेजी से किसी को ऊपर उठाता है, उतनी ही तेजी से नीचे भी ला सकता है।
कांबली का टेस्ट करियर बहुत लंबा नहीं चला।
उन्होंने अपना आखिरी टेस्ट 1995 में खेला और कुल 17 टेस्ट में 1,084 रन बनाए।
एक खिलाड़ी जिसने इतनी तेज शुरुआत की थी, उसका अंतरराष्ट्रीय टेस्ट सफर कुछ ही वर्षों में थम गया।
13 मार्च 1996—ईडन गार्डन्स की वह तस्वीर
फिर आया वह दिन जिसे भारतीय क्रिकेट प्रेमी शायद कभी नहीं भूल सकते।
13 मार्च 1996।
ईडन गार्डन्स, कोलकाता।
विश्व कप सेमीफाइनल।
भारत बनाम श्रीलंका।
भारत मुश्किल में था।
स्टेडियम में तनाव बढ़ता गया।
दर्शकों की बेकाबू प्रतिक्रिया के कारण मैच रोकना पड़ा।
उस समय क्रीज पर मौजूद विनोद कांबली 10 रन पर नाबाद थे।
लेकिन मैच खत्म हो चुका था।
भारत हार गया था।
और कांबली मैदान से बाहर निकलते हुए रो रहे थे।
वह तस्वीर भारतीय क्रिकेट की सबसे भावुक तस्वीरों में शामिल हो गई।
एक खिलाड़ी आउट नहीं हुआ था।
फिर भी हार गया था।
जब क्रिकेट मैदान छूटता है, तो सवाल बच जाता है—मैं कौन हूं?
यहां से कहानी क्रिकेट से निकलकर इंसान की कहानी बन जाती है।
खेल मनोविज्ञान में लंबे समय से इस बात पर चर्चा होती रही है कि जिन खिलाड़ियों की पहचान बचपन से पूरी तरह उनके खेल के साथ जुड़ जाती है, उनके लिए खेल से दूरी बनाना मानसिक रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
क्योंकि अचानक वह सवाल सामने आता है—
“अगर मैं क्रिकेटर नहीं हूं, तो मैं कौन हूं?”
कांबली के जीवन में भी इसके बाद कई मोड़ आए।
टीम में वापसी की कोशिशें हुईं।
घरेलू क्रिकेट खेला।
टेलीविजन पर दिखाई दिए।
फिल्म में काम किया।
रियलिटी शो में आए।
2009 में राजनीति में भी कदम रखा।
मानो वह जिंदगी में कोई दूसरा मैदान खोज रहे हों।
लेकिन शायद सबसे कठिन मैच वह था जो मैदान के बाहर खेला जा रहा था।
सचिन से शिकायत… और फिर वही दोस्त
2009 में कांबली ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि उन्हें लगता है कि सचिन तेंदुलकर उनकी मदद कर सकते थे।
इस बयान के बाद दोनों की दोस्ती को लेकर लंबे समय तक चर्चा होती रही।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।
2013 में सचिन ने वानखेड़े पर अपना आखिरी टेस्ट खेला।
विदाई भाषण में कांबली का नाम नहीं आया।
कांबली ने बाद में इस बात पर अपनी निराशा व्यक्त की।
लेकिन उसी साल जब कांबली को दिल से जुड़ी गंभीर समस्या के कारण अस्पताल में इलाज कराना पड़ा, उन्होंने बाद में बताया कि सचिन ने उनके दोनों ऑपरेशनों का खर्च उठाया था।
यानी रिश्ते हमेशा एक लाइन में नहीं चलते।
कभी शिकायत होती है।
कभी दूरी।
कभी गलतफहमी।
और कभी वही इंसान मुश्किल समय में साथ खड़ा मिलता है।
2024 में कांबली ने खुद कहा कि उन्होंने सचिन के बारे में जो शिकायतें की थीं, वे उस समय की निराशा से निकली थीं और सचिन ने उनके लिए बहुत कुछ किया।
शराब से लड़ाई—और 14 बार रिहैब
कांबली की जिंदगी का सबसे कठिन अध्याय उनकी शराब की लत से जुड़ा रहा है।
इसके लिए वह कई बार पुनर्वास केंद्रों में गए।
उनकी पत्नी एंड्रिया हेविट ने 2025 में एक बातचीत में बताया कि कांबली कम-से-कम 14 बार रिहैब जा चुके थे।
यह आंकड़ा सुनकर शायद पहला विचार आता है—
“14 बार? फिर भी?”
लेकिन नशे की लत को केवल इच्छाशक्ति की कमी समझना समस्या को बहुत सरल बना देना है।
लत एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या हो सकती है और रिकवरी में कई प्रयास लग सकते हैं।
कांबली की कहानी का मतलब यह नहीं कि हर व्यक्ति का परिणाम एक जैसा होगा।
लेकिन यह जरूर बताती है कि एक असफल प्रयास को अंतिम असफलता मान लेना सही नहीं है।
एंड्रिया ने तलाक के लिए आवेदन किया… फिर वापस लिया
कांबली की पत्नी एंड्रिया ने 2023 में तलाक के लिए आवेदन किया था।
उन्होंने बाद में बताया कि उन्होंने यह कदम वापस ले लिया क्योंकि उन्हें लगा कि कांबली उनके बिना बेहद असहाय हो जाएंगे।
उन्होंने यह भी बताया कि कई बार वह घर से निकल जाती थीं, लेकिन फिर चिंता होती थी—
“उसने खाना खाया होगा?”
और वह वापस लौट आती थीं।
यह कहानी किसी आदर्श रिश्ते की कहानी नहीं है।
क्योंकि उनके वैवाहिक जीवन में गंभीर विवाद और घरेलू हिंसा के आरोप भी सार्वजनिक रूप से सामने आए थे। इसलिए इसे केवल त्याग या रोमांस की कहानी बनाना वास्तविकता को अधूरा करना होगा।
लेकिन कठिन परिस्थितियों के बावजूद उनका साथ बने रहना कांबली की रिकवरी के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण हिस्सा जरूर है।
दिसंबर 2024—सचिन ने फिर हाथ पकड़ा
3 दिसंबर 2024।
शिवाजी पार्क।
रमाकांत आचरेकर के स्मारक के उद्घाटन का अवसर।
वही शिवाजी पार्क जहां कभी दो बच्चे क्रिकेट सीखते थे।
वहीं कई वर्षों बाद सचिन और कांबली फिर एक-दूसरे के सामने थे।
कांबली की हालत देखकर लोग भावुक हो गए।
सचिन उनके पास गए।
कांबली ने उनका हाथ पकड़ लिया और काफी देर तक पकड़े रहे।
बाद में कांबली ने अपने गुरु आचरेकर की याद में “सर जो तेरा चकराए” गीत गाया और सचिन ने तालियां बजाईं।
एक समय दोनों ने क्रिकेट के मैदान पर 664 रन जोड़े थे।
अब जिंदगी के मैदान में एक दोस्त दूसरे दोस्त का हाथ पकड़े खड़ा था।
जब कपिल देव ने कहा—एक और मौका
कांबली की हालत देखकर 1983 विश्व कप विजेता टीम के सदस्यों ने उनकी मदद की पेशकश की।
कपिल देव ने रिहैब में जाने के लिए सहायता देने की बात कही।
कांबली ने इसे स्वीकार किया और कहा कि अगर उनका परिवार साथ है तो उन्हें डर नहीं लगता।
उन्होंने यह भी कहा कि वह इलाज पूरा करेंगे और वापस आएंगे। उस समय यह उनका 15वां रिहैब प्रयास होने वाला था।
इस घटना में एक महत्वपूर्ण बात छिपी थी—
मदद बाहर से मिल सकती है, लेकिन इलाज में भाग लेने का निर्णय व्यक्ति को खुद लेना पड़ता है।
अस्पताल, दिमाग में खून के थक्के और फिर एक और संघर्ष
दिसंबर 2024 में कांबली की तबीयत बिगड़ी और उन्हें ठाणे के अस्पताल में भर्ती कराया गया।
रिपोर्टों के मुताबिक जांच में उनके मस्तिष्क में blood clots पाए गए थे। अस्पताल से उन्होंने डॉक्टरों के प्रति आभार व्यक्त किया और कहा कि वह उनके निर्देशों का पालन करेंगे।
यह सिर्फ शराब की समस्या नहीं थी।
उनकी शारीरिक सेहत भी गंभीर चुनौतियों से गुजर रही थी।
और फिर भी वह लगातार इलाज की ओर लौटते रहे।
एक जर्सी, एक संदेश
अस्पताल से बाहर आने के समय कैमरों के सामने कांबली ने लोगों से शराब और नशे से दूर रहने की अपील की।
यह दृश्य इसलिए अलग था क्योंकि संदेश किसी किताब से नहीं आया था।
यह उस व्यक्ति की आवाज थी जिसने खुद इस संघर्ष को झेला था।
कई बार जिंदगी का सबसे प्रभावशाली संदेश वह व्यक्ति देता है जिसने उसी समस्या की कीमत खुद चुकाई हो।
“परिवार ने छोड़ दिया”—लेकिन तस्वीर कुछ और कहती है
जब ठाणे के केयर सेंटर का वीडियो वायरल हुआ तो सोशल मीडिया पर यह धारणा फैल गई कि कांबली को उनके परिवार ने छोड़ दिया है।
लेकिन उपलब्ध सार्वजनिक बयानों से ऐसी सीधी तस्वीर नहीं बनती।
उनके भाई वीरेंद्र ने पहले भी उनकी स्थिति के बारे में लोगों को बताया था और लोगों से उनके लिए दुआ करने की अपील की थी।
उनकी पत्नी एंड्रिया भी उनके संघर्ष और इलाज के बारे में सार्वजनिक रूप से बात कर चुकी हैं।
सचिन तेंदुलकर ने भी कठिन समय में उनके साथ अपने संबंधों और मदद के बारे में कांबली स्वयं बता चुके हैं।
और हालिया Nidan Centre के बारे में सामने आई जानकारी के मुताबिक, कांबली को वहां अस्पताल से भेजा गया था और वहां उन्हें देखभाल तथा फिजियोथेरेपी मिल रही है। केंद्र के संस्थापक ने उनके प्रति सम्मान और मुफ्त देखभाल की बात कही है।
इसलिए किसी वायरल वीडियो को देखकर यह निष्कर्ष निकाल देना कि “परिवार ने छोड़ दिया” तथ्य से ज्यादा एक अनुमान होगा।
और फिर कैमरे के सामने कांबली
अब लौटते हैं सितंबर 2026 के उस वीडियो पर।
वह बोलते हैं।
शब्दों के बीच रुकते हैं।
चेहरे पर उम्र और बीमारी की थकान दिखाई देती है।
लेकिन फिर भी वह बताते हैं कि उन्हें वहां प्यार मिल रहा है।
यह किसी क्रिकेट मैच का स्कोरकार्ड नहीं है।
यह जिंदगी की पारी है।
यहां कोई रन रेट नहीं है।
कोई सेंचुरी नहीं।
कोई ट्रॉफी नहीं।
बस एक लक्ष्य है—
ठीक होना।
14 पारियां बनाम 14 रिहैब
क्रिकेट में 14 पारियों में 1,000 रन पहुंचना असाधारण उपलब्धि है।
और 14 बार रिहैब जाना भी एक ऐसी संख्या है जो बताती है कि संघर्ष कितना लंबा रहा।
लेकिन दोनों आंकड़ों को एक साथ रखकर कांबली को सिर्फ “गिरे हुए क्रिकेटर” के रूप में देखना अधूरा होगा।
पहले आंकड़े ने उन्हें इतिहास में जगह दी।
दूसरे ने हमें उनके संघर्ष से परिचित कराया।
लेकिन शायद उनकी जिंदगी का सबसे महत्वपूर्ण आंकड़ा 15वां प्रयास है।
क्योंकि वह कहता है—
मैं फिर कोशिश करूंगा।
लत को सिर्फ जिद मत समझिए
हमारे समाज में किसी व्यक्ति के बार-बार शराब या नशे की ओर लौटने पर अक्सर कहा जाता है—
“इसमें इच्छाशक्ति नहीं है।”
“यह सुधरना ही नहीं चाहता।”
“इसे कोई फर्क नहीं पड़ता।”
लेकिन चिकित्सा विज्ञान नशे की समस्या को इससे कहीं अधिक जटिल मानता है।
रिकवरी में दोबारा फिसलना संभव है।
इसका अर्थ यह नहीं कि आगे की कोशिश बेकार है।
अमेरिका का National Institute on Drug Abuse भी बताता है कि substance-use disorders में relapse हो सकता है और ऐसी स्थिति में उपचार को फिर से शुरू या समायोजित करने की जरूरत पड़ सकती है।
यानी—
फिसलना उपचार की समाप्ति नहीं है।
कांबली की कहानी का असली नायक कौन है?
शायद कोई एक व्यक्ति नहीं।
क्योंकि इस कहानी में कई लोग हैं।
एक पत्नी, जिसने मुश्किल समय में साथ दिया।
एक भाई, जिसने लोगों से उनके लिए दुआ करने को कहा।
एक बचपन का दोस्त, जिसने बीमारी के समय मदद की।
क्रिकेट जगत के लोग, जिन्होंने सहायता की पेशकश की।
डॉक्टर और देखभाल करने वाले लोग।
और खुद विनोद कांबली।
क्योंकि आखिरकार इलाज के दरवाजे तक पहुंचना और उसके भीतर कदम रखना भी उनकी अपनी कोशिश है।
यह कहानी सिर्फ विनोद कांबली की नहीं है
आपके आसपास भी शायद कोई ऐसा व्यक्ति होगा—
जो कभी बहुत अच्छा था।
फिर शराब में फंस गया।
या किसी दूसरी लत में।
घरवालों ने बहुत समझाया।
कई बार इलाज कराया।
वह फिर लौट आया।
परिवार थक गया।
गुस्सा आया।
रिश्ते टूटने लगे।
और आखिर में सबने कहना शुरू कर दिया—
“अब यह कभी नहीं सुधरेगा।”
शायद ऐसे घरों में कांबली की कहानी एक बात याद दिला सकती है—
इलाज की कोशिश बंद मत कीजिए।
इसका अर्थ यह नहीं कि परिवार अपनी सीमाएं भूल जाए या नुकसान सहता रहे।
सुरक्षा, सीमाएं और पेशेवर उपचार जरूरी हैं।
लेकिन किसी व्यक्ति को उसकी बीमारी से पूरी तरह परिभाषित कर देना भी समाधान नहीं है।
क्रिकेट की पारी जल्दी खत्म हुई थी… जिंदगी की पारी अभी चल रही है
विनोद कांबली की टेस्ट पारी बहुत छोटी रही।
प्रतिभा असाधारण थी।
करियर अपेक्षाओं जितना लंबा नहीं हुआ।
लेकिन जिंदगी का स्कोरकार्ड अभी बंद नहीं हुआ है।
आज वह क्रिकेट की तरह तेज नहीं चल सकते।
शब्दों को बोलने में दिक्कत होती है।
उन्हें सहारे की जरूरत पड़ती है।
लेकिन कैमरे के सामने बैठकर वह अपनी स्थिति के बारे में बात कर रहे हैं।
इलाज जारी है।
और यही सबसे महत्वपूर्ण बात है।
कभी-कभी वापसी का मतलब फिर से मैदान पर उतरना नहीं होता
वापसी का मतलब ट्रॉफी जीतना भी नहीं होता।
कभी-कभी वापसी का अर्थ सिर्फ इतना होता है—
आज शराब से दूर रहना।
आज दवा लेना।
आज डॉक्टर की बात मानना।
आज परिवार से बात करना।
आज फिर रिहैब जाना।
आज फिर कोशिश करना।
और अगर कल फिर गिर गए—
तो परसों फिर उठना।
विनोद कांबली की सबसे बड़ी पारी शायद अभी बाकी है
एक समय वह सचिन तेंदुलकर के साथ 664 रन की साझेदारी करने वाला लड़का था।
फिर वह भारत के लिए दोहरे शतक लगाने वाला बल्लेबाज बना।
फिर उसका क्रिकेट करियर समाप्त हो गया।
फिर रिश्ते टूटे।
फिर शराब से संघर्ष हुआ।
फिर अस्पताल आए।
फिर रिहैब आया।
फिर बीमारी।
फिर परिवार।
फिर दोस्त।
फिर एक और कोशिश।
और अब ठाणे के एक केयर सेंटर से उसकी आवाज आ रही है—
इलाज चल रहा है।
शायद यही इस कहानी की सबसे जरूरी लाइन है।
क्योंकि जब तक इलाज चल रहा है, तब तक उम्मीद की संभावना भी बनी रहती है।
अंत में सिर्फ इतना
कांबली की कहानी को देखकर उन पर फैसला सुनाना आसान है।
लेकिन शायद जरूरी यह है कि हम उनकी कहानी से अपने आसपास के किसी इंसान को पहचानें।
वह पिता जो शराब के बाद चुप हो जाता है।
वह भाई जो बार-बार इलाज छोड़ देता है।
वह दोस्त जो कहता है, “मैं ठीक हूं”, जबकि वह ठीक नहीं होता।
या वह इंसान जो सबके सामने मुस्कुराता है, लेकिन अकेले में टूट रहा है।
उसे सिर्फ यह मत कहिए—
“तुम बदलते क्यों नहीं?”
कभी यह भी पूछिए—
“तुम्हें ठीक होने के लिए हमारी किस तरह की मदद चाहिए?”
क्योंकि बीमारी का नाम निदान है।
इलाज उसका रास्ता है।
और रिकवरी—
एक बार की जीत नहीं, बार-बार की कोशिश है।
विनोद कांबली की जिंदगी हमें शायद यही सिखाती है—
मैच हार जाना और मैच खत्म हो जाना, दोनों एक बात नहीं हैं।
जब तक इंसान अगली गेंद खेलने के लिए तैयार है, पारी बाकी है।
— Asha Times Magazine | विशेष फीचर


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