कुणाल शतक महान सम्राट अशोक के पुत्र वीर कुणाल की काव्य गाथा है जो कि पूरे 100 काव्यांश में लिखी गई है, इसके रचयिता कामता प्रसाद मौर्य "विचित्र” सेवानिवृत्त अध्यापक स्थान व पोस्ट भरथा ब्लाक रेउसा, जिला सीतापुर थे ।
कविता का सारांश
सम्राट अशोक मौर्य की पत्नी कारु बाकी की मृत्यु के बाद ई0पू0 250 में अपनी 48वीं वर्ष की आयु में उन्होंने 18 वर्षिया एक अति सुन्दरी कन्या कु० तिष्यरक्षिता से विवाह किया जो दूसरी पटरानी बनाई गई।
सम्राट अशोक धम्म यात्रा में गये थे वहाँ से आने में उन्हें कई माह लग गये। इसी अन्तराल में नवोढ़ा रानी तिष्यरक्षिता कामुक होकर 16 वर्षीय सुन्दर बलिष्ट राजकुमार कुणाल पर मोहित होकर उससे सम्भोग करने की याचना की, किन्तु धर्मात्मा अशोक का नीतिवान पुत्र होने के कारण विमाता की इस इच्छा को अस्वीकार कर दिया, जिससे वह जल-भुन कर कुणाल से ईर्ष्या करने लगी थी 248 ई०पू० में कुमार कुणाल का ब्याह कंचन माला के साथ हुआ, एक बार तक्षशिला के राजा कुंजरकर्ण को परास्त करने हेतु कुणाल को भेजा गया, उसी समय तिष्यरक्षिता ने अशोक की मुद्रा अंकित आदेश भेजवाया कि कुमार कुणाल की आँखे निकलवाकर उसे अन्धा करके राज्यच्युत कर दिया जाये। पिता की आज्ञा स्वीकार करके कुणाल ने सहर्ष अपनी आँखे निकलवा दी।
कुछ समय पश्चात् तक्षशिला से अपनी पत्नी कंचन माला के साथ भुिक्षक बनकर 233 ई०पू० पाटलीपुत्र पहुँच कर रात्रि में पिता की घुड़साल में अपनी चिर परिचित बीणा बजाने लगे। सम्राट को कुणाल होने का संदेह हुआ, उन्हे बुलाकर आँखे निकलने का कारण पूछा कुणाल ने सब कुछ साफ-साफ बता दिया, सम्राट बहुत क्रोधित होकर तिष्यरक्षिता को प्राण दण्ड देना चाहा, कुणाल ने कहा आप बौद्ध मत अनुयायी हैं वैसे भी स्त्री हत्या आपके लिए वर्जित है। ऐसा करके आप पाप के भागी न हों। आँखे खो जाने पर मुझे दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई है मैं विमाता की सभी कुकृत्यों को माफ करने की याचना आप से करता हूँ। इसी ऐतिहासिक घटना को कविता के रूप में कुणाल शतक नाम से प्रकाशित करके आप लोगों के सम्मुख प्रस्तुत करता हूँ। आशा है आप इसे सहर्ष स्वीकार करेंगे और नव युवक नव युवतियों को इसे पढ़ने से मातृ-पितृ भक्त होने की प्रेरणा अवश्य मिलेगी।
••कुणाल शतक••
भारतीय इतिहास में अंकित है यह कथा पुरानी, सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी।
पिपली कानन राज्य में यक क्षत्रिय कुल मौर्य वंश का था,
उस वंश में जन्मा चन्द्रगुप्त सारे भारत का शासक था।
यूनानी सेल्यूकस को भी जिनसे हार पड़ी खानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 1 ।।
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चन्द्रगुप्त का पुत्र एक बिन्दुसार नाम से प्रचलित था,
जिसका प्यारा पुत्र अशोक महान उपाधि से चर्चित था।
उसका सुपुत्र कुणाल बहुत ही रूपवान था ज्ञानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणल की करुणा जनक कहानी ।। 2 ।।
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हुआ जन्म जिस दिन कुणाल का सारे जन हर्षाये,
पाटलि पुत्र में जगह-जगह पर उत्सव गये मनाये।
पिता अशोक सम्राट मौर्य माता पद्मावित रानी, सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी
।। 3 ।।
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चन्द्र समान सौम्य शिशु था रवि समान तेजस्वी, नव प्रभात की आभा सम उद्दीप्तमान ओजस्वी ।
आकर्षक नेत्रों को लखा पैदा होती सुखखानी, सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी
।। 4 ।।
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धर्म विवर्धन नाम पूर्व में था प्रोहित ने बतलाया, लाख नेत्र कुणाल पक्षी समान सम्राट ने नाम ये कहलाया।
छः दाइयों की देख-रेख में होता शिशु का उबटन पानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 5 ।।
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ज्यों-ज्यों शिशु के अंग सौष्ठव आकार में वृद्धि होती थी,
त्यों-त्यों आँखे अति आकर्षक सुन्दर मन मोहक होती थीं।
सम्राट अशोक ने इन्हे अन्त में शासन देने की ठानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 6 ।।
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दाइयाँ वाटिका में कुणाल को जब भी खेल खिलाये,
उस भोलेपन को लता ओट से लख अशोक हर्षाये ।
इक दिन मुँह से निकल पड़ा है पुत्र श्रेष्ठ गुण खानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 7 ।।
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स्थाविर यशस के आश्रम में भेजा जब होश सँभाला,
धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ था गुप्त कलायें पढ़ डाला।
शिक्षायें पाकर असीम नहिं हुए ज़रा भी अभिमानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुण जनक कहानी ।। 8 ।।
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छात्र कुणाल के सर्वागो से ऋषिवर यशस प्रसन्न हुए,
पर दृष्टिहीन हो जाने के लक्षण से वे अति खिन्न हुए।
आँका जब बुरे लक्षणों को तो हुई उन्हें हैरानी, सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी
।। 9 ।।
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यह भीषण भविष्यवाणी तुरन्त सम्राट अशोक तक पहुँच गई,
पूछा ज्योतिषियों से था तब, सम्राट ने कोई युक्ति नई।
बोले ज्योतिषी न टलने की, यह ऋषि यशस की वाणी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 10 ।।
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हो गये दुःखी सम्राट तभी प्रियवर कुणाल को समझाया,
जो किया भविष्य वाणी गुरु ने, उसके बारें में बतलाया।
सब कार्य करो गुरु आज्ञा से मत करो जरा भी मनमानी,
सम्राट' अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 11 ।।
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एकान्त में पा गुरु चरणों को, था कुणाल ने नमन किया,
गुरु यशस ने शिष्य की दशा, जान करके था उस पर रहम किया।
शारीरिक अंग है सभी श्रेष्ठ पर नेत्र श्रेष्ठता की खानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 12 ।।
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नेत्रों के द्वारा ही प्राणी शुभ कर्मों में पड़ जाता है, नेत्रों द्वारा ही पा कलंक दुःख सागर में घबड़ाता है।
नेत्रों की है क्या हस्ती सारा शरीर ही है फानी, सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 13 ।।
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गुरु शिक्षा पर चिन्तन करके वे शयन कक्ष के थे गामी,
पक्षी दिनभर का श्रम खोने, निज कोटर के थे अनुगामी।
अस्ताचल गामी सूरज की कुछ ही क्षण की थी महामानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 14 ।।
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वायु भी पक्षियों की उड़ान और वृक्षों पर जोर लगाती थी,
संध्या कालीनी किरणें छन वृक्ष से कक्ष में आती थीं।
लेकिन कुणाल को नेत्रों की यह सुष्मा नहीं सुहानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 15।।
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गुरु यशस की वाणी के प्रभाव से मन उनका नहि मुक्त हुआ,
क्षण भंगुर संसार है यह इस सोच से मन अनुरक्त हुआ।
भगवान बुद्ध की शरण में सब त्यागे जाने की ठानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 16 ।।
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उस समय पाटली पुत्र में इक त्योहार मनाया जाता था,
नाच रंग के साथ-साथ नाटक भी रचाया जाता था।
सुन्दर परिधानों से सजकर नागरिक थे करते पदगामी,
सम्राट अशोक प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी
।। 17 ।।
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उस समय तिष्यरक्षिता जो नव व्याही अशोक की रानी थी,
यौवन के मद में चूर थी वह अपने मन की मनमानी थी।
सम्राट से बात छिपा करके कुछ और ही करने की ठानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 18।।
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वह अन्य रानियों से सुन्दर नव यौवन से इतराती थी,
प्रणय लालसा के हेतू नव युवक कुमार चाहती थी।
इस हेतु कुमार कुणाल से ही वह प्रेम बढ़ाने की ठानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 19 ।।
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सॉध्योत्सव में था आमंत्रण उद्यान में आज सर्वजन को,
लेंगे कुणाल जी भाग नाट्य में जो करें मुग्ध सबके मन को।
लालाइत थी अभिनय से वह नव ब्याही अशोक की रानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 20 ।।
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नन्दन सा मंच अभिनन्दित था अतिदिव्य छटा छहराती थी,
पुष्पों की सुगन्धित वायु भी मन मन्दिर को हर्षाती थी।
वातावरण उस बेला का था अद्भुत "विचित्र" लासानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 21 ।।
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ज्योतिस्ना से परिपूर्ण चन्द्र नभ ऊपर शोभा पाता था,
आबाल-वृद्ध वनिता विनोद-मय हो आनन्द मनाता था।
दर्शक वृन्दों का आकर्षक बन रही नवोढ़ा थी रानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 22 ।।
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अभिनय अति ही आकर्षक था रङ्गीन मधुर मन मोहक,
सौंदर्य-सागर में डूब गये दर्शक, अभिनय था रोचक।
पटाक्षेप के बाद वहाँ पर हुआ था बिल्कुल सुनसानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 23 ।।
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जब रात तीसरे पहर गई सब गहरी निद्रा सोये थे,
अभिनय के बाद कुणाल तुरन्त निज शयन कक्ष में सोये थे।
नेत्रों के सम्मुख इतने में एक आकर्षक युवती दिखलानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 24 ।।
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सोंचा कुणाल ने ऐसे में यह कौन सुन्दरी पतिता है,
फिर सहमें और उठ कर बैठे देखा यह तिष्य रक्षिता है।
जब खुले अधर उसके, सुनकर पड़ गये सैकड़ों घट पानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 25 ।।
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जब कुणाल को ज्ञात हुआ चाहती है विमाता क्या उससे,
बोला माता होकर तू क्यों चाहे अनुचित व्यवहार मुझसे।
लख ठण्डा व्यवहार कुणाल की रानी को हुई हैरानी, सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 26 ।।
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उसके सौंदर्य की दमक शीर्घ विकराल ज्वाल में बदल उठी,
हो गया दर्प चूर उसका नागिन की भांति फुफकार उठी।
बोली मैं भस्म करा दूँगी इस अगनि से तेरी जवानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 27 ।।
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तब कहा कुणाल ने हूंगा नहि विचलित कर्तव्यों से अपने,
सत् चरित्र को मैं दूँगा स्थान सदा ऊँचा अपने। विकराल रूप से घूरा था तब अभागिनी कुल्टा रानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 28।।
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कुञ्जर कर्ण एक था राजा उस समय तक्षिला नगरी में,
बैभव में जलकर भेजा था संघर्ष सूचना पत्री में। उसकी प्राजय हित मंत्री ने कुणाल को भेजने की ठानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 29 ।।
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सम्राट अशोक ने बात मान कुमार कुणाल को बोलवाया,
देकर सामग्री-सैन्य उन्हे प्रस्थान तक्षशिला करवाया।
नत मस्तक होकर कुंजर ने कुणाल की अधीनता थी मानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 30 ।।
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विजई होकर के कुणाल प्रस्ताव वापसी करवाया,
पर कुंजर कर्ण राजा ने उन्हे आतिथ्य रूप में ठहराया।
ठहरे थे वे बनकर अतिथ्य गृह उसके निज सुहृद् जानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 31 ।।
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पटली पुत्र में तब अशोक ने विजय का उत्सव करवाया,
प्रियदर्शी कुणाल के आदर हित था नगर को सजवाया।
पर कुणाल कुंजर के धाम कर रहा था उसकी महिमानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 32 ।।
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कर रहे, प्रतीक्षा अति उमंग से थे कुणाल की तब अशोक,
प्रतिक्षण विस्मृति नहि होते थे छाया था मन में अधिक शोक।
दिन पर दिन थे बीत रहे थी उनके मन में अति ग्लानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 33 ।।
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अप्रत्यासित रोग से फिर सहसा सम्राट अस्वस्थ हुए,
राजचिकित्सक हार गये पर किसी भाँति नहि स्वस्थ हुए।
तब कहा बुलाओं शीघ्र कुणाल को करें न अब वह महमानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 34 ।।
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नवोढ़ा रानी ने निज प्रयास से सम्राट को पूरा स्वस्थ किया,
इसी खुशी में पति से उसने मनमाना वर प्राप्त किया।
सोचा कुणाल की कर दूँ मैं इस वर द्वारा जीवन हानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 35 ।।
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बोली सम्राट से मुझे सात दिन हेतु निजी शासन दे दो,
है शौक मुझे सम्रागी का फिर अपना शासन वापस ले लो।
स्वीकार किया सम्राट ने तब बन गई थी सम्राज्ञी रानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 36 ।।
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तब राजकीय मुद्रा अंकित एक पत्र था उसने मँगवाया,
व्यभिचार विमाता से करने का आरोप था उस पर लिखवाया।
अब शेष थी केवल चिट्ठी पर सम्राट की मोहर लगानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 37 ।।
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फिर रात्रि में चुपके-चुपके वह शयन कक्ष में पहुँची थी,
खटका पाकर सम्राट जगे तब हालत उसने पूँछी थी।
उद्देश्य एक ही था केवल सम्राट की निजी मोहर पानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 38 ।।
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फिर बुरा स्वप्न देखा कुणाल के प्रति बोले वे घबड़ा कर,
दोनो नेत्रों को गिद्धों ने है निकाल फेका बाहर। स्वप्नों का उल्टा होता प्रभाव बोली मत करो परेशानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 39 ।।
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सो गये तुरंत सम्राट तभी, कुल्टा फौरन बाहर आई,
आज्ञा अश्वारोहियों को दी, दे पत्र तक्षशिला पहुँचाई।
सम्राट के ढ़िग वह बैठ गई जाकर के फिर दुष्टा रानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 40 ।।
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तत्पश्चात अशोक को फिर स्वप्न दिखाई पड़ता है,
इस बार कुणाल मलिन अन्धे भिखमंगे रूप में दिखता है।
है दाढ़ी-केश नाखून बढ़े तन की है दशा भुलानी, सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी
।। 41 ।।
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नभ में प्रभात के चिन्ह जगे लालिमा उषा की फैली थी,
शीतल मंद समीर ने फिर सम्राट को निद्रित कर दी थी।
दिखते थे गिरते दाँत मुँह से इस स्वप्न से हुई हैरानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 42 ।।
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शय्या से प्रातः उठते ही सम्राट ने ज्योतिषी बोलवाया,
संतान के प्रति था अंग नाश और मृत्यु का योग भी बतलाया।
तब शोकित हो उसने कुणाल हित यज्ञ कराने की ठानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 43 ।।
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संदेश वाहक चलते-चलते वह पत्र तक्षशिला पहुँचाया,
कुंजर कर्ण ने उसे पढ़कर आश्यर्च चकित हो दुःख पाया।
कुछ दिनों सोच-विचारने पर कार्यवाही करने की ठानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 44 ।।
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उस पत्र में था बस यह अंकित आदेश यही हैं शासन का,
निकला लो आँखे कुणाल की, है यह बहुत कुटिल मन का।
व्यभिचारी है यह विमाता का इसको है सजा तुरंत पानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 45 ।।
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अल्पकाल में ही कुणाल जी प्रजा जनो के प्रिये हुये,
दण्डाज्ञा का संदेश सुना तब शोकाकुल हो विकल हुये।
सोच-विचार के बाद कुणाल को पत्र दे राजाज्ञा मानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 46 ।।
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पाकर कुणाल ने पत्र ज़रा भी नहीं धैर्य को तोड़ा था,
आज्ञा पालन हित तत्पर हो निज जीवन से मुख मोड़ा था।
आँखे निकलाने के डर से नहि ज़रा उन्होंने भय मानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 47 ।।
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कर दिया गया निर्धारित दिन स्थल में भीड़ थी जमा हुई,
कुँवर कुणाल को लाकर के दुष्कर्म सूचना पढ़ी गई।
आज्ञा का उलंघन कर डाला हो गई बहेलिये को ग्लानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी।। 48 ।।
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छाया सन्नाटा सभा में था देखे अब क्या होता है,
वाणी विनर्म बोले कुणाल क्यों आज्ञा पालन नहि होता है।
अपहरण करूं नहि ज्योति को मति नहीं है मेरी पगलानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 49 ।।
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लखकर सन्नाटे को कुणाल ने भुजदण्ड व मुकुट उतार दिये,
उपहार स्वरूप लगे देने, पर लेने से सभी इनकार किये।
फिर कहा जो आभूषण चाहे वह शीघ्र ही आवे अगवानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 50 ।।
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सुन बचन एक कुबड़ा कुरुप कोने से उठ कर आया था,
गुरु की भविष्य वाणी कुणाल को उस क्षण याद दिलाया था।
नश्वर है विश्व की सभी वस्तु जीवन भी है सारा फानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 51 ।।
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इर्ष्या-द्वन्द रँग राग त्याग शिव जी की शरण में जाना है,
जीवन की चंचलता नश्वरता पर मेरा भी मन माना है।
फिर कुबड़े से आशा की थी कोए से आँखे निकलानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 52 ।।
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फैलाकर हाथ कुणाल ने फिर एक आँख बहेलिए से ले ली,
लख आँख दूसरी आँख से वह बोले नश्वर है जीवन ही।
यह जघन्य-कृत्य लख कुबड़े का सारी जनता अकुलानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 53 ।।
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पथ भ्रष्ट है जो आभास करे सारा शरीर यह अपना है,
पूरा ज्ञानी वही है जो कहता, यह जीवन सपना है।
जब युगल नेत्र थे निकल गये सब जनता शोक समानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 54 ।।
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दुःख से व्याकुल हो जनता ने एक साथ ही हाहाकार किया,
शोकोद्गार से भीड़ ने तब अपशब्द का प्रबल प्रहार किया।
वाह्य चक्षु की ज्योति गई, है आंतरिक दृष्टि अपनानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 55 ।।
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यह दृश्य बहुत दुखदाई था, अति ही विकराल भयंकर था,
मानव-मानवता को खाने में स्वार्थी जमाना तत्पर था।
इस भाँति दुखी जन प्रिय कुणाल को आशा थी बँधवानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 56 ।।
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तब कहा कुणाल ने जोरों से प्रिय जनों सुनो मेरी वाणी,
वे नेत्र नही हैं अब मेरे जिससे भ्रम में रहता प्राणी।
है अन्तर्दृष्टि प्राप्त हुई भ्रम-जाल की दृष्टि नसानी।
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 57 ।।
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सम्राट का पुत्र यदि नही रहा श्री बुद्ध का शिष्य रहूँगा ही,
नेत्रों की सर्वोच्ता खोकर के प्रभु की साया पाऊँगा ही।
निर्वाण मार्ग बुद्ध जी का यह उत्तम मंजिल है पानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 58 ।।
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मैं शरीर नहीं आत्मा हूँ ऐसा विश्वास ही है सच्चा,
आत्मा अमर है मानव की नश्वर शरीर ही है कच्चा।
ब्रह्मा जी को यह वाणी जन-जन ने है सच्ची मानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 59 ।।
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तक्ष शिला के राज-भवन में यह विश्वास पात्र आत्मा थी,
अनविज्ञ कृत्य से भी बिल्कुल, अंधे पति की प्रियात्मा थी।
तब समाचार असहि सुनकर वह बुरी दशा से अकुलानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 60 ।।
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घटना स्थल पर कंचन माला प्रियतम को नेत्रहीन पाया,
बैठी पति के ढ़िग घुटनों बल, पूँछ क्यों ऐसा अवसर आया।
फिर मुर्छित होकर गिरी वहीं जीवन से हुई ग्लानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 61 ।।
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जब होश हुआ कंचन माला बोली प्रियतम् से कातर हो,
हो जाये जीवन नष्ष्ट मेरा तो कार्य बहुत ही रुचिकर हो।
अन्तर्दृष्टि के प्रकाश से बोला कुणाल क्यों घबड़ानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 62 ।।
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ऐ प्रिये सभी को मिलता है निज कृत्यों का ही तो प्रतिफल,
सत्कर्मों से ग्रस्त हुये प्राणी को समझो पूर्ण सफल।
दुःख पड़ने पर जो धैर्य रखे वह प्राणी है सच्चा ज्ञानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 63 ।।
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कुंजर से कुणाल ने कतिपय दिन रहने की वहीं आज्ञा लेली,
शारीरिक, मानसिक कष्टों को सह करके वहीं रक्षा करली।
फिर कहा प्रिये से क्या होगा छुट गई है अपनी रजधानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 64 ।।
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बोला कुणाल जा सकती हो निज पिता के घर कंचन माले,
ऐ आर्य पुत्र मत बचन कहो प्रियतम से पृथक करने वाले। मैं रहूँगी छाया बनकर चरणों की करूँ मैं अनुगामी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 65 ।।
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दम्पति कुणाल ने उसी दिवस कुँजर से विदा माँग ली थी,
भिक्षुक-सदृश्य वे निकले थे एक वीणा हाथ में ले ली थी।
बिन सेवक व बिन वाहन के वे हुए थे दोनो पदगामी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 66 ।।
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नहि मन रंजन के साधन थे न खाद्य सामग्री पास में थी,
इस घोर विपत्ती के क्षण में आर्य कन्या केवल साथ में थी।
जब ठहरे ग्राम में मिलता था ग्रामीणों से भोजन पानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 67 ।।
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मंजिले काटने के थे वे अभ्यस्थ हुए धीरे-धीरे, चिथड़ो में थे दोनो प्राणी दिन कटते थे धीरे-धीरे। सम्राट के है यह पुत्र-वधू नहि सका कोई पहिचानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 68 ।।
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अन्ततः वसंत की ऋतु समीप आती-जाती थी यात्रा में,
गायन-वादन में रूचि लेती थी जनता पूरी मात्रा में।
दिन बसंत के पहुँचे थे, पाटली पुत्र दोनो प्राणी, सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 69 ।।
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कर लिया था निश्चय दोनो ने सम्राट के पास पहुँच जाना,
रथ सारथियों के मध्य आज घुड़साल में रात बिताना।
लख दीनदशा इन लोगों की नहि कर सकता कोई पहिचानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 70 ।।
❀❀❀
निज दशा भान करते-करते नहि सोये किंचित रात में थे,
सन्तप्त हृदय शीतल करने वीणा को उठाया प्रात में थे।
आन्दोलित था प्रासाद-राज जब स्वरलहरी लहरानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 71 ।।
❀❀❀
वीणावादन के साथ-साथ स्वरचित कविता का पाठ किया,
बचपन से लेकर अब तक का सब करुण प्रसंग का गान किया।
आन्तरिक दृष्टि थी उदय हुई, बाहरी दृष्टि नशानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 72 ।।
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आन्तरिक दृष्टि बौधिक आभा का किस भाँति विकास हुआ,
नेत्रों, शारीरिक कष्टों के सुख का किस भाँति विनाश हुआ।
भावी सुख-दुःखों वाली कविता की कड़ी थी बतलानी।
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 73 ।।
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अन्तर्द्रष्टि से देखने की क्षमता जो प्राप्त कर लेता है,
आवागमनों के बन्धन से वह मुक्ति प्राप्त कर लेता है।
सम्राट अशोक के श्रवणों में गायन की ध्वनी समानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 74 ।।
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निद्रित-जाग्रती अवस्था में सुनवाणी सम्राट थे हर्षाये,
चिर परिचित है यह कण्ठ स्वर है कौन जो वाणी बर्षाये।
फिर ध्यान से समझे और बोले यह है कुणाल की ही बाणी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 75 ।।
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फिर द्वारपाल से बोले थे, यह कौन कहाँ से गाता है,
इस ध्वनि में ऐसी करुणा है, मन मेरा पिघला जाता है।
वह जहाँ भी है फौरन जाकर है तुरंत खोज करवानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 76 ।।
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देखा यक अन्ध भिखारी को जो वीणा के तार बजाता है,
पति पत्नी धूल धूसरित है, अपनी मस्ती में गाता है।
उन दीन युगल भिखारियों को नहि सका कोई पहिचानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 77 ।।
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चिंतित होकर अशोक बोले, उन्हें स्वप्न का था आभास हुआ,
षडयंत्र से किस निकलीं आखें, इसका था नहीं प्रकाश हुआ।
तत्काल भिक्षुओं को लाओं, मत करों ज़रा आना-कानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 78 ।।
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तब द्वार पाल फौरन जाकर रथागार में पहुँचा था,
क्या नाम है? किसके पुत्र हो तुम ? यह जाकर उनसे पूँछा था।
सम्राट अशोक का पुत्र हूँ मैं नाम कुणाल बखानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 79 ।।
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फिर कहा कि अब मैं पुत्र उसी भगवान बुद्ध का हूँ जिसने,
दैवी विधान की रचना कर, दिव्य ज्योति है दी जिसने।
तब द्वारपाल ने लिया तुरंत उन दोनों को पहिचानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 80 ।।
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फिर उसने उन भिक्षुओं को तत्काल ही पहुँचाया था वहाँ,
आतुर है प्रतीक्षा करते थे, बेचैन अशोक सम्राट जहाँ।
सम्राट ने जब देखा उनको तब हुई उन्हें हैरानी, सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 81 ।।
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प्रसाद राज से मिली हुई एक सुन्दर आम्र वाटिका थी,
माधवी पुष्पों की गन्ध से थी सुरभित कुणाल नासिका थी।
पछियों के सुन्दर कलरव से कानों में होती गुन्जानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 82 ।।
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राजकीय कीमती जीर्ण वस्त्र निज गौरव की कहानी कहते थे,
झुरियों युक्त अन्धे शरीर को सम्राट ध्यान से लखते थे।
फिर बोले तुम हो बेटा कुणाल है बात सही बलतानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी।। 83 ।।
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बोले हाँ मैं ही हूँ कुणाल आप ही का लाडला कुणाल,
हैं आप हमारे पूज्य पिता नहि करता आपसे कोई जाल।
अब है शरीर में शक्ति नहीं, है रक्त माँश की हानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 84 ।।
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सम्राट तुरंत लड़खड़ा गये और पृथ्वी पर गिर जाते हैं,
तब कनिष्ठ मंत्री के द्वारा अति शीघ्र उठाये जाते हैं।
इस महान दुःख के कारण सब तन की दशा भुलानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 85 ।।
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शासन के यशवस्वी अधिकारी नत्रों से हुए कैसे वंचित,
इस जन्म का है कोई पाप नहीं, है पूर्वजन्म का पाप संचित।
फिर चाहा सुनना दुखियो से उनकी अतीत कहानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 86 ।।
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राजकीय आदेश जो घुड़सवारों द्वारा तक्षिशिला नगरी पहुँचाया था,
रानी द्वारा रचे हुये षड्यन्त्र का हाल बताया था। उस ही आदेश के द्वारा ही पड़ गई थी आँखे निकलानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 87 ।।
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है किया अहित जो माता ने मुझे वाह्य नेत्रों से वंचित,
बदल गई वह मेरे हित में अब अन्तर दृष्टि है संचित ।
अतः बुराई के प्रति मुझ को मिली है सुख की रवानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 88 11
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फिर तिष्यरक्षिता तुरन्त वही सम्राट के ढिग थी लाई गई,
आग्नेय नेत्रों से घूरा, सम्राट थे क्रोधित अधिकाई।
कुल घातिन, पापिन तू क्यों पृथ्वी में नही समानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 89 ।।
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तू दुष्टा, कुल्टा, क्रूर कुटिल निर्दई बहुत ही है नारी,
तू कुल घातिनी कलंकिनी है मैं करूँ अभी तेरी ख्वारी।
जैसे को तैसा पाने हित है तेरी भी आँखे निकलानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 90 ।।
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फिर सारी दुर्गति के बाद तुझे मैं शूली पर लटकाऊँगा,
अपने प्रिय पुत्र के दुःखो का इस भाँति से मैं बदला लूँगा।
सुन करके घोषणा वह कुल्टा रोई, सहमी, और थर्रानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 91 ।।
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कुछ काल बाद सन्नाटे के मंत्री ने कहा यह समझाई,
महामहिम क्या विस्मृत है, हैं आप बौद्ध मत अनुयाई।
क्यों भूल रहे हैं आप अरे भगवान बुद्ध की वाणी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 92 ।।
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करूण व्यक्ति ही करूणा पाने का होता है अधिकारी,
अहिंसा ही हिंसा का समुचित उत्तर है जो है सुखकारी।
तब कुणाल ने सुन करके चाहायह बात बतानी, सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 93 ।।
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बोला कुणाल तब यह वाणी सम्राट के चरणों में गिरकर,
होगी अप्रतिष्ठा का कारण माँ, तिष्य रक्षिता का वध कर।
यो वर्जित है स्त्री हत्या नहि करो प्रतिष्ठा की हानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 94 ।।
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मेरे अन्तर मन में अपनी इस माँ के प्रति भलाई है,
षड्यन्त्र से नेत्र निकलने पर भी अन्र्तदृष्टि आई है।
अहिंसा के प्रेरक भगवन की महिमा है मैने पहिचानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 95 ।।
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उत्तराधिकारी कुणाल की यह वाणी हर मन में फैल गई,
प्रिय कुणाल के ज्ञान की चर्चा पाटली पुत्र में फैल गई।
अब अशान्ति का लोप हुआ मिट गई सभी हैरानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 96।।
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नव युवती, नवयुवक, कभी मत भूले निज कर्तव्यों को,
मर्यादा पूर्वक रामचन्द्र सम अपनावे शुचि नियमों को।
जिससे पवित्र चरित्रों पर नहि कालिखपड़े लगानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 97 ।।
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ऐतिहासिक सच्ची घटना कविता के रूप में अर्पित है,
कुणाल शतक नामक पुस्तक जिज्ञासु जनो को समर्पित है।
यदि भूल हुई हो कवि से कुछ उसे क्षमा करेंगे ज्ञानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 98।।
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संसार में जब तक सूर्य-चन्द्र चमके और बहे पवन पानी,
अमर रहेगी यह तब तक अहिंसा की वियज कहानी।
अब "विचित्र” कवि को है कविता आगे नही बढ़ानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 99 ।।
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कामता प्रसाद लघु नाम मेरा जनपद सीतापुर बासी हूँ,
रेउसा ब्लाक के भरथा का ही मैं ग्राम निवासी हूँ।
अध्यापन सेवा से निवृत्त हो रचा कुणाल कहानी,
सम्राट अशोक के प्रिय कुणाल की करुणा जनक कहानी ।। 100 ।।
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ईतिशुभम्
रचयिता:
कामता प्रसाद मौर्य "विचित्र"
सेवा निवृत्त अध्यापक
एवं
श्रीमती रामप्यारी कुशवाहा
ग्राम व पोस्ट भरथा, ब्लाक रेउसा, सीतापुर, उ०प्र०
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