प्रत्येक विषय में ऐसा काफी कुछ होता है जिसे जानना आवश्यक होता है। जानकारी होने पर व्यक्ति को सही दिशा मिलती है और अनेक भ्रामक विचारधाराओं से भी बचा जा सकता है। सेक्स से सम्बन्धित सभी स्थितियों के बारे में जानकारी होना अत्यन्त आवश्यक है। इसके अभाव में एक छोटी सी समस्या को भी व्यक्ति रोग समझ बैठता है और नीम हकीमों के चंगुल में जा फंसता है। इस क्षेत्र में लोगों का ज्ञान काफी कम होता है इसलिये व्यक्ति हमेशा ही अपने आपको किसी न किसी समस्या से घिरा हुआ पाता है। व्यक्ति की इस कमजोरी को भली प्रकार से भांप कर आज नीम हकीम और खानदानी चिकित्सकों की बाढ़ सी आई हुई है। इनसे आम व्यक्ति को बचाने के लिये यहाँ कुछ आवश्यक जानकारियां दी जा रही हैं जो अनेक प्रकार के भ्रमों से व्यक्ति को बचाने में महत्त्वपूर्ण साबित होंगी-
1. सहवास से पहले उत्तेजित लिंग के द्वारा मूत्र मार्ग से रिसने वाले द्रव की बूँदें वीर्य नहीं होती हैं। यह मात्र कुछ ग्रन्थियों का रस होता है। कामशास्त्र के कुछ विद्वानों का मत है कि इस द्रव में किंचित् शुक्राणु भी विद्यमान रहते हैं।
2. हस्तमैथुन (हाथ के घर्षण द्वारा वीर्य निकालना) की बुरी आदत कोई रोग नहीं है। न ही इसमें किसी प्रकार की शारीरिक अथवा मानसिक हानि होती है। किशोरावस्था में यौन ग्रन्थियों की परिपक्वता यौन तनाव को जन्म देती है। इसी तनाव से मुक्ति पाने के लिए हस्तमैथुन को सहज सुलभ साधन के रूप में प्रायः सभी किशोर और युवा कभी न कभी अपना बैठते हैं। साथ ही यह लिख देना भी आवश्यक है कि हस्तमैथुन एक सीमित मात्रा में (महीने में 3-4 बार तक) ही उचित है। अति होने पर कई प्रकार की मानसिक और शारीरिक बीमारियों का सामना करना पड़ सकता है।
3. सहवास काल के बीच में स्खलन से पहले बीच-बीच में लिंग को योनि से बाहर निकाल लेने अथवा आसन बदल लेने से सम्भोग की अवधि कुछ समय तक और बढ़ाई जा सकती है।
4. नींद की अवस्था में वीर्यपात होना जिसे स्वप्नदोष कहते हैं, कोई रोग नहीं है। युवावस्था में यह भी यौन-ग्रन्थियों की पूर्ण परिपक्वता के कारण होता है। शरीर में वीर्य किशोरावस्था से ही बनना प्रारम्भ हो जाता है। विवाह पूर्व इसे सहवास द्वारा निकालना सम्भव नहीं होता है। इसी कारण यह सोते हुए स्वप्नदोष के माध्यम से अपने आप निकल जाता है। शरीर के विकास क्रम में होने वाली यह एक सहज और स्वाभाविक प्रक्रिया है। माह में 2 से 4 बार स्वप्न दोष होना सामान्य है।
5. मासिक धर्म के पश्चात् स्त्रियाँ प्रायः सहवास में अधिक रुचि लेने लगती हैं इसके अलावा मासिक के पश्चात् उनकी यौन भावना कुछ उग्र भी हो उठती है।
6. सामान्य से अधिक आकार-प्रकार का लिंग होना इस बात का द्योतक नहीं है कि वह वास्तव में सम्भोग काल को अधिक समय तक चला सकता है। लिंग के आकार-प्रकार की बजाय सहवास की कला एवं तकनीक अधिक महत्त्वपूर्ण है।
7. मासिक धर्म के चलते सहवास से गर्भ नहीं होता, यह एक आम धारणा है किन्तु अपवाद स्वरूप ऐसा हो जाना असम्भव भी नहीं है।
8. गर्भ धारण के लिए डिम्ब प्रणाली आवश्यक है, क्योंकि सामान्यतः डिम्ब प्रणाली में शुक्राणु डिम्ब से मिलकर गर्भाधान करता है।
9. नव-विवाहित पति के लिए यह जानना नितांत असंभव है कि उसकी नव-विवाहिता पत्नी विवाह से पूर्व कभी किसी से यौन सम्बन्ध बना चुकी है अथवा नहीं। डॉक्टरी जाँच द्वारा भी इस बात का पता लगाना असंभव है कि किसी स्त्री की योनि में लिंग प्रवेश हुआ है कि नहीं क्योंकि ऐसी जाँच का एकमात्र आधार योनि के भीतर की कुमारीच्छद झिल्ली का उपस्थित होना है किन्तु बहुधा किसी प्रकार की दुर्घटना अथवा खेलकूद में विवाह से पूर्व यह झिल्ली स्वतः ही फट सकती है।
10. स्त्री को सहवास काल में चरम सुख प्राप्त हो अथवा नहीं लेकिन वह गर्भ धारण कर सकती है। गर्भ के लिए डिम्ब के साथ शुक्राणुओं का मिलना ही आवश्यक है। शारीरिक और मानसिक संतुष्टि से इसका किसी प्रकार का कोई सम्बन्ध नहीं है।
11. सहवास में अरुचि अथवा उदासीनता दिखाने वाली स्त्री को ही कामशीतल अथवा ठण्डी औरत कहा जाता है। यद्यपि कुछ यौन विशेषज्ञों के मतानुसार चरम सुख प्राप्त करने में अयोग्यता को भी काम शीतलता अथवा ठण्डापन कहा जाता है।
12. वृषण कोष सर्दी-गर्मी में तुरन्त प्रभावित हो जाते हैं। वृषण कोष का तापमान शरीर के तापमान से कम रहता है क्योंकि शुक्राणु शरीर के तापमान पर जीवित नहीं रह सकते, इसलिए शरीर से अलग वृषण कोषों में सुरक्षित रहते हैं।
13. शुक्राणुओं को मौसम के प्रभाव के उतार-चढ़ाव से बचाने में वृषण कोषों की थैली काफी मदद करती है। इसलिए गर्मी में वह ढीली होकर नीचे लटक जाती है। और सर्दियों में सिकुड़ जाती है।
14. पुरुष के अंग विशेष को देखकर स्त्रियाँ प्रायः उतनी उत्तेजित नहीं होती जितनी की स्त्री के विशेष अंगों को देखकर पुरुष काम उत्तेजना का अनुभव करता है।
15. स्त्रियों में भंगाकुर, योनि, स्तन व स्तन चूचुक (निप्पल) ही सबसे अधिक अनुभूतिशील अंग होते हैं। इन अंगों को उत्तेजित करने के थोड़ी देर बाद ही स्त्रियों में काम उत्तेजना आ जाती है।
16. प्रसव की तिथि को मालूम करने का सहज और सही तरीका इस प्रकार है- विगत अन्तिम मासिक धर्म की तारीख से तीन महीने और पीछे जाकर उसमें सात दिन और जोड़ दें।
17. उदाहरण के लिए यदि गर्भवती स्त्री को अन्तिम मासिक धर्म 10 मार्च को हुआ था तो तीन महीने पीछे जाने पर 10 दिसम्बर आता है। इसमें सात दिन और जोड़ने पर 17 दिसम्बर हो जाएगा। यही अगली 17 दिसम्बर प्रसव की तिथि होगी। इसमें सामान्यतः एक दो दिन आगे-पीछे हो सकते हैं।
18. शीघ्रपतन कोई ऐसा रोग नहीं है जिसका इलाज नहीं हो। दवा के साथ इस दशा में मनोविज्ञान, आत्मिक संयम तथा यौन विशेषज्ञ की सलाह लेना अधिक लाभदायक है।
19. मनुष्य के एक बार के स्खलन में दो से पाँच मिली लीटर अर्थात् चाय के एक चम्मच के बराबर वीर्य बाहर निकलता है।
20. एक बार के स्खलन के समय कितने शुक्राणु बाहर निकलते हैं, इसकी संख्या का अनुमान लगाना संभव नहीं है। फिर भी अनुमानों के आधार पर कहा जा सकता है कि एक बार के स्खलन में इनकी संख्या 60 से 150 मिलीयन तक होती है।
21. वीर्य जब बाहर निकलता है तो गाढ़ा एवं चिपचिपा होता है किन्तु पन्द्रह बीस मिनट बाद यह पानी की तरह पतला हो जाता है। इसका कारण है कि स्खलन के बाद वीर्य के शुक्राणु गतिशील होते हैं किन्तु धीरे-धीरे ये गतिहीन होते चले जाते हैं। इसी कारण वीर्य पतला हो जाता है।
22. जिन व्यक्तियों का वीर्य पतला और पानी जैसा हो उन्हें अपने आप ही अनुमान लगा लेना चाहिये कि उनके वीर्य में विकार आ गया है। उनके वीर्य में शुक्राणु बहुत कम मात्रा में हैं और गतिशील भी नहीं हैं। इसका सीधा असर उनकी संतानोत्पादक क्षमता पर पड़ सकता है।
23. गाढा और अधिक मात्रा में वीर्य का निकलना ही इस बात का प्रमाण नहीं है कि पुरुष गर्भ धारण कराने में सक्षम है। महत्त्वपूर्ण बात तो यह है कि वीर्य में उपस्थित शुक्राणुओं की संख्या पर्याप्त है या नहीं तथा वे स्वस्थ व गतिशील भी हैं कि नहीं?
24. सामान्यतः गर्भाशय व अण्डाशय के निकल जाने के पश्चात स्त्रियों की काम सम्बन्धी उत्तेजना पहले की अपेक्षा काफी कम हो जाती है परन्तु यह कमी भंगाकुर द्वारा उत्तेजना प्राप्त करके दूर की जा सकती है। चिकित्सक की सलाह से हारमोन्स द्वारा इलाज किया जा सकता है।
25. सम्भोग क्रिया में कमर द्वारा संचालन के कारण यदि स्त्री को योनि में पीड़ा अथवा टई का अनुभव होता है तो इसका यह अर्थ बिलकुल नहीं है कि योनि का मार्ग संकरा अथवा तंग है। यह गर्भाशय तथा गर्भ मुख की स्थिति में गड़बड़ होने का स्पष्ट संकेत है। ऐसा होने पर तत्काल अच्छे चिकित्सक की सेवाएं लेनी चाहिए।
26. सहवास की अवधि में वीर्य निकलने की आशंका होने के पलभर पहले ही पुरुष अपनी गुदा को कसकर भींच ले तो। इससे वीर्यस्खलन के समय को थोड़ा बढ़ाया जा सकता है।
27. एक बार स्खलन के बाद जब पुनः सहवास किया जाता है तो पुरुष को तो स्खलित होने में पिछली बार की अपेक्षा अधिक समय लगता है, परन्तु इसके विपरीत, स्त्रियाँ पिछली बार के सहवास की अपेक्षा शीघ्र चरम सुख की प्राप्ति कर लेती हैं।
28. स्त्रियाँ बिलकुल अकेले में, रात में, अन्धेरे में और चाँदनी रात में ही यौन समागम में अधिक दिलचस्पी लेती हैं। पूर्ण निश्चितता की स्थिति में अपने पुरुष साथी को अधिक से अधिक सहयोग देती हैं। ऐसे में दोनों को ही अधिक यौनानन्द प्राप्त होता है।
29. स्त्रियों के अन्दर पूरी तरह से काम उत्तेजना पैदा किये बिना उनको चरम सुख तक नहीं पहुंचाया जा सकता। इसके लिए आवश्यक है कि सम्भोग से पूर्व प्राक् क्रीड़ा के द्वारा उन्हें पूर्ण उत्तेजित करके काम के लिए तैयार किया जाये।
30. पुरुषों की काम भावना स्त्रियों की अपेक्षा अधिक तेजी से भड़क उठती है और उसी तेजी से शांत भी हो जाती है। स्त्रियों में इसके ठीक उल्टा होता है। उनमें काम भावना धीरे-धीरे पैदा होती है लेकिन अधिक देर तक बनी रहती है।
31. स्त्रियों में काम के प्रति अधिक इच्छा एवं उत्तेजना विभिन्न समयों में मासिक धर्म के बाद में भिन्न-भिन्न प्रकार से कम अथवा अधिक पाई जाती है।
32. काम के लिए उत्तेजना पैदा होने के पश्चात् यदि शर्म अथवा संकोच के कारण स्त्री लिंग प्रवेश के लिए मुँह से कहे अथवा न कहे परन्तु अन्य चेष्टाओं के द्वारा वह इस बात के स्पष्ट संकेत कर देती है कि अब वह योनि में लिंग प्रवेश चाहती है। स्त्री की दृष्टि का बार-बार नीचे योनि प्रदेश की तरफ उठना उसकी इच्छा का मूक संकेत होता है। साथी पुरुष को सावधानीपूर्वक उसकी चेष्टाओं पर ध्यान रखना चाहिए।
33. चरम सुख में पुरुषों की भांति स्त्रियों में भी चरम सुख जैसी अनुभूति होती है।


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