संतान का सुख नहीं मिला, तो हजारों पेड़ों की मां बन गईं सालुमरदा थिमक्का


बेंगलुरु/कर्नाटक। समाज के तानों को अपनी कमजोरी नहीं, बल्कि अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाकर इतिहास रचने वाली सालुमरदा थिमक्का आज पर्यावरण संरक्षण की वैश्विक पहचान बन चुकी हैं। संतान न होने के कारण जीवनभर उपेक्षा और अपमान झेलने वाली इस साधारण महिला ने हार मानने के बजाय प्रकृति को अपना परिवार बना लिया। उन्होंने बरगद के हजारों पेड़ों को अपने बच्चों की तरह लगाया, उनका पालन-पोषण किया और पूरी दुनिया को यह संदेश दिया कि सच्चा मातृत्व केवल जन्म देने तक सीमित नहीं, बल्कि संरक्षण और पालन-पोषण में भी निहित है।

कर्नाटक के तुमकुरु जिले के गुब्बी तालुक के एक बेहद गरीब परिवार में जन्मी थिमक्का बचपन से ही कठिन परिस्थितियों में पली-बढ़ीं। आर्थिक तंगी के कारण वह औपचारिक शिक्षा भी प्राप्त नहीं कर सकीं। युवावस्था में उनका विवाह खेतिहर मजदूर चिक्कैया से हुआ। विवाह के कई वर्षों बाद भी जब उन्हें संतान नहीं हुई, तो समाज ने उन्हें तानों और अपमान का सामना करने पर मजबूर कर दिया। इस कठिन दौर में उनके पति ने उनका पूरा साथ दिया और दोनों ने अपने जीवन को एक नई दिशा देने का संकल्प लिया।

पति-पत्नी ने अपने गांव हुलिकल और कुदूर के बीच लगभग चार किलोमीटर लंबे मार्ग को हरा-भरा बनाने का निर्णय लिया। उन्होंने बरगद के पौधे लगाने शुरू किए। पहले वर्ष चार पौधे लगाए, अगले वर्ष 15 और फिर हर साल यह संख्या बढ़ती गई। मजदूरी से लौटने के बाद दोनों घंटों तक पौधों की देखभाल करते, कई किलोमीटर दूर से सिर और कंधों पर पानी ढोकर उन्हें सींचते और आवारा पशुओं से बचाने के लिए कांटेदार झाड़ियों से उनकी सुरक्षा करते थे। उनके लिए ये पौधे किसी संतान से कम नहीं थे।

समय के साथ उनकी अथक मेहनत रंग लाई। आज उस मार्ग पर करीब 385 विशाल बरगद के वृक्ष खड़े हैं, जो एक घने हरित गलियारे का रूप ले चुके हैं। इसके अलावा उन्होंने अपने जीवनकाल में 8,000 से अधिक अन्य पेड़ भी लगाए। उनके लगाए गए वृक्ष आज लाखों लोगों को छाया, स्वच्छ हवा और पर्यावरणीय संतुलन प्रदान कर रहे हैं। यही कारण है कि उन्हें प्रेम और सम्मान से "वृक्ष माता" भी कहा जाता है।

कन्नड़ भाषा में "सालुमरदा" का अर्थ "पेड़ों की कतार" होता है। यही उपाधि समय के साथ उनकी पहचान बन गई और दुनिया उन्हें सालुमरदा थिमक्का के नाम से जानने लगी। पर्यावरण संरक्षण में उनके असाधारण योगदान के लिए भारत सरकार ने वर्ष 2019 में पद्म श्री से सम्मानित किया। वहीं, वर्ष 2020 में कर्नाटक केंद्रीय विश्वविद्यालय ने उन्हें मानद डॉक्टरेट की उपाधि प्रदान कर उनके योगदान को सम्मानित किया।

थिमक्का का जीवन इस बात का जीवंत उदाहरण है कि दृढ़ इच्छाशक्ति, सेवा भावना और सकारात्मक सोच के बल पर कोई भी व्यक्ति समाज में अमिट पहचान बना सकता है। उन्होंने यह साबित किया कि यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में कुछ पेड़ लगाने और उनकी देखभाल करने का संकल्प ले, तो धरती को आने वाली पीढ़ियों के लिए अधिक सुरक्षित और हराभरा बनाया जा सकता है।

सालुमरदा थिमक्का की प्रेरक यात्रा केवल पर्यावरण संरक्षण की कहानी नहीं है, बल्कि यह आत्मसम्मान, संघर्ष, धैर्य और मानवता की ऐसी मिसाल है, जो हर व्यक्ति को विपरीत परिस्थितियों में भी सकारात्मक बदलाव लाने की प्रेरणा देती है। उनका जीवन संदेश देता है कि इंसान की सबसे बड़ी पहचान उसके कर्म होते हैं, और प्रकृति की सेवा से बड़ा कोई धर्म नहीं।

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