नई दिल्ली: कभी-कभी किसी बड़े बदलाव की शुरुआत किसी बड़ी कंपनी, बड़े संस्थान या किसी ताकतवर व्यक्ति से नहीं, बल्कि एक छोटी-सी दुकान से होती है। दिल्ली विश्वविद्यालय के कैंपस में चलने वाली एक ऐसी ही छोटी फोटोकॉपी की दुकान ने भारत में कॉपीराइट और शिक्षा के अधिकार को लेकर एक ऐतिहासिक कानूनी लड़ाई को जन्म दिया।
यह कहानी है धर्मपाल सिंह और उनकी रमेश्वरी फोटोकॉपी सर्विस की—एक ऐसी दुकान की, जहां कभी सिर्फ 50 पैसे प्रति पेज में छात्रों के लिए पढ़ाई की सामग्री की फोटोकॉपी की जाती थी।
सामने थे दुनिया के बड़े अकादमिक प्रकाशक—Oxford University Press, Cambridge University Press और Taylor & Francis।
मुकदमा लगभग चार साल चला। मामला दिल्ली हाई कोर्ट तक पहुंचा और अंततः इसने भारत में यह महत्वपूर्ण सवाल खड़ा किया कि क्या शिक्षा और पढ़ाई के उद्देश्य से कॉपीराइट वाली सामग्री की प्रतियां बनाना भी कॉपीराइट उल्लंघन है?
1998 में शुरू हुई थी छोटी-सी दुकान
धर्मपाल सिंह ने वर्ष 1998 में दिल्ली विश्वविद्यालय के दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स परिसर में एक लाइसेंस प्राप्त छोटी-सी जगह पर रमेश्वरी फोटोकॉपी सर्विस शुरू की थी।
दुकान का काम बिल्कुल सामान्य था—छात्रों और शिक्षकों के लिए दस्तावेजों और पढ़ाई की सामग्री की फोटोकॉपी करना।
लेकिन धीरे-धीरे इस दुकान का काम विश्वविद्यालय की पढ़ाई की जरूरतों से जुड़ गया।
प्रोफेसर अपने छात्रों के लिए किसी विषय की जरूरी किताबों और शोध लेखों की सूची तैयार करते थे। एक ही विषय के लिए कई अलग-अलग किताबों और जर्नल्स के अध्याय पढ़ने होते थे।
मसलन, किसी को Agrarian Sociology जैसा कोर्स पढ़ना है तो उसके लिए दर्जनों अलग-अलग पुस्तकों और लेखों से चयनित सामग्री पढ़नी पड़ सकती थी।
छात्रों के सामने समस्या यह थी कि इन सभी किताबों को खरीदना बेहद महंगा था। कई किताबें इतनी महंगी थीं कि सामान्य छात्र के लिए उन्हें खरीदना व्यावहारिक नहीं था। वहीं विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी में भी किसी किताब की केवल एक या कुछ प्रतियां उपलब्ध होती थीं।
यहीं से शुरू हुआ कोर्स पैक का चलन।
एक पैक में पूरी पढ़ाई की सामग्री
धर्मपाल सिंह जरूरी अध्यायों और लेखों की फोटोकॉपी करते और उन्हें एक साथ बांधकर छात्रों को उपलब्ध कराते थे।
इन बंडलों को Course Packs कहा जाता था।
छात्रों को अलग-अलग 30-40 किताबों की तलाश नहीं करनी पड़ती थी। उन्हें कोर्स में निर्धारित जरूरी सामग्री एक ही जगह मिल जाती थी।
और इसकी कीमत?
सिर्फ 50 पैसे प्रति पेज।
धर्मपाल सिंह के लिए यह कोई बड़ा व्यावसायिक मॉडल नहीं था। उनका तर्क सीधा था—अगर किसी छात्र को एक कोर्स के लिए दर्जनों अलग-अलग किताबों से सामग्री पढ़नी है, तो उन सभी पुस्तकों को ढूंढना और खरीदना उसके लिए बेहद मुश्किल और महंगा हो सकता है। एक कोर्स पैक उसे सारी जरूरी सामग्री एक जगह उपलब्ध करा देता है।
लेकिन यही काम आगे चलकर एक बड़े कॉपीराइट विवाद का केंद्र बन गया।
2012 में आया बड़ा मुकदमा
अगस्त 2012 में Oxford University Press, Cambridge University Press और Taylor & Francis ने दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
इन प्रकाशकों का आरोप था कि उनकी कॉपीराइट वाली पुस्तकों और लेखों की सामग्री की बिना अनुमति फोटोकॉपी कराकर छात्रों को दी जा रही है।
उन्होंने अदालत से मांग की कि धर्मपाल सिंह की दुकान और दिल्ली विश्वविद्यालय को ऐसी सामग्री की फोटोकॉपी करने से स्थायी रूप से रोका जाए।
मामला गंभीर था।
एक तरफ दुनिया के प्रतिष्ठित अकादमिक प्रकाशक थे, जिनकी किताबें और शोध सामग्री दुनिया भर के विश्वविद्यालयों में इस्तेमाल होती थीं।
दूसरी तरफ विश्वविद्यालय परिसर में चलने वाली एक छोटी-सी फोटोकॉपी की दुकान थी।
2012 के अंत तक अदालत ने एक अंतरिम आदेश के जरिए फोटोकॉपी गतिविधि पर रोक लगा दी।
दुकान पर बिना पूर्व सूचना के एक कमिश्नर भेजा गया। दुकान में मौजूद कॉपी की गई सामग्री की सूची तैयार की गई और कई प्रतियां जब्त कर ली गईं।
ऐसा लग रहा था कि मामला यहीं खत्म हो जाएगा।
लेकिन असली कहानी इसके बाद शुरू हुई।
छात्र आए दुकान के समर्थन में
मुकदमे ने छात्रों के बीच भी बड़ा सवाल खड़ा कर दिया।
अगर महंगी किताबों के जरूरी अध्यायों की फोटोकॉपी पर रोक लगती है, तो आर्थिक रूप से कमजोर छात्र अपनी पढ़ाई कैसे जारी रखेंगे?
इसके बाद छात्र संगठनों और शिक्षा तक आसान पहुंच के लिए काम करने वाले समूहों ने इस मामले में हस्तक्षेप किया।
उन्होंने अदालत के सामने अपना पक्ष रखने की मांग की और फोटोकॉपी दुकान तथा छात्रों के अधिकारों के समर्थन में खड़े हुए।
अब यह मामला सिर्फ एक दुकान बनाम तीन प्रकाशकों का नहीं रह गया था।
यह सवाल बन गया था—
शिक्षा तक पहुंच ज्यादा महत्वपूर्ण है या कॉपीराइट का व्यावसायिक अधिकार?
309 लेखकों और शिक्षाविदों ने लिखा खुला पत्र
मामले ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ध्यान खींचा।
मार्च 2013 में दुनिया भर के 309 लेखकों और शिक्षाविदों ने प्रकाशकों को एक खुला पत्र लिखकर मुकदमा वापस लेने की अपील की।
इसमें सबसे दिलचस्प बात यह थी कि इनमें से 33 लोग उन्हीं किताबों के लेखक थे, जिनकी सामग्री की फोटोकॉपी को लेकर विवाद चल रहा था।
यानी जिन पुस्तकों के कॉपीराइट का हवाला देकर मुकदमा किया गया था, उन्हीं पुस्तकों के कुछ लेखक छात्रों को उनकी सामग्री तक पहुंच दिए जाने के पक्ष में खड़े थे।
यह मामला धीरे-धीरे एक बड़े सामाजिक और शैक्षणिक विमर्श में बदल गया।
अदालत में उठा शिक्षा और कॉपीराइट का सवाल
मामले का मूल सवाल था कि भारतीय कॉपीराइट कानून में शिक्षा के उद्देश्य से की जाने वाली प्रतिलिपि का क्या स्थान है।
क्या हर फोटोकॉपी के लिए कॉपीराइट धारक की अनुमति जरूरी है?
या फिर कानून में शिक्षा के लिए ऐसी गतिविधियों को कुछ परिस्थितियों में संरक्षण प्राप्त है?
16 सितंबर 2016 को दिल्ली हाई कोर्ट के एकल न्यायाधीश जस्टिस राजीव सहाय एंडलॉ ने मुकदमा खारिज कर दिया।
फैसले में कॉपीराइट को लेकर व्यापक दृष्टिकोण सामने आया और यह विचार महत्वपूर्ण रहा कि कॉपीराइट का उद्देश्य केवल अधिकारों की रक्षा करना नहीं, बल्कि ज्ञान के प्रसार और शिक्षा के व्यापक उद्देश्य के साथ संतुलन बनाना भी है।
लेकिन प्रकाशकों ने इस फैसले को चुनौती दी।
9 दिसंबर 2016: ऐतिहासिक फैसला
इसके बाद मामला दिल्ली हाई कोर्ट की दो जजों की बेंच के सामने गया।
9 दिसंबर 2016 को अदालत ने अपना फैसला सुनाया।
अदालत ने भारतीय कॉपीराइट कानून में मौजूद शिक्षा संबंधी अपवाद की व्याख्या करते हुए माना कि शिक्षण और पढ़ाई के उद्देश्य से कॉपीराइट सामग्री की प्रतियां बनाना, उचित परिस्थितियों में, कॉपीराइट उल्लंघन नहीं माना जाएगा।
कोर्स पैक के संदर्भ में अदालत ने यह स्पष्ट किया कि केवल इसलिए कि किसी कॉपीराइट पुस्तक का बड़ा हिस्सा कॉपी किया गया है, वह स्वतः अवैध नहीं हो जाता। महत्वपूर्ण यह है कि सामग्री का इस्तेमाल किस उद्देश्य से और किस शैक्षणिक संदर्भ में किया जा रहा है।
इस फैसले ने भारत में शिक्षा और कॉपीराइट के बीच संतुलन को लेकर एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल स्थापित की।
इसके बाद प्रकाशकों ने मुकदमा वापस ले लिया।
यह सिर्फ एक फोटोकॉपी की दुकान की जीत नहीं थी
इस मामले को केवल धर्मपाल सिंह की व्यक्तिगत जीत के रूप में देखना शायद इसकी पूरी कहानी नहीं बताता।
यह मामला एक बड़े सवाल से जुड़ा था—
क्या ज्ञान सिर्फ उन लोगों के लिए होना चाहिए जो उसकी कीमत चुका सकते हैं?
विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले हर छात्र की आर्थिक स्थिति एक जैसी नहीं होती। महंगी अकादमिक किताबें और शोध सामग्री कई छात्रों के लिए बड़ी बाधा बन सकती हैं।
दूसरी तरफ लेखक और प्रकाशक भी अपनी बौद्धिक संपदा की सुरक्षा और उससे जुड़े आर्थिक अधिकारों को लेकर चिंतित रहते हैं।
इसीलिए इस मामले की अहमियत इस बात में थी कि अदालत को इन दोनों हितों के बीच संतुलन तलाशना पड़ा।
एक छोटी दुकान, बड़ा संदेश
धर्मपाल सिंह की कहानी इसलिए भी याद की जाती है क्योंकि यह दिखाती है कि कानून केवल ताकतवर लोगों के लिए नहीं होता।
एक तरफ अंतरराष्ट्रीय स्तर के बड़े अकादमिक प्रकाशक थे और दूसरी तरफ विश्वविद्यालय परिसर में 50 पैसे प्रति पेज की फोटोकॉपी करने वाला छोटा कारोबारी।
चार साल तक चली कानूनी लड़ाई ने शिक्षा, कॉपीराइट और छात्रों की पहुंच से जुड़े सवालों को राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बना दिया।
अंततः अदालत ने शिक्षा के उद्देश्य को कॉपीराइट कानून की व्याख्या में महत्वपूर्ण स्थान दिया।
और यही इस कहानी का सबसे बड़ा संदेश है—
ज्ञान की पहुंच और बौद्धिक संपदा के अधिकारों के बीच संतुलन जरूरी है।
दिल्ली विश्वविद्यालय परिसर की वह छोटी-सी फोटोकॉपी की दुकान इस बात की मिसाल बन गई कि कभी-कभी कानून की सबसे बड़ी बहसें बड़े कॉरपोरेट कार्यालयों में नहीं, बल्कि एक छोटी-सी दुकान के काउंटर से शुरू होती हैं।
धर्मपाल सिंह की दुकान शायद आकार में छोटी थी, लेकिन उसके आसपास खड़ा हुआ सवाल बहुत बड़ा था—
क्या शिक्षा की राह में कॉपीराइट की दीवार इतनी ऊंची हो सकती है कि छात्र ज्ञान तक पहुंच ही न पाएं?
दिल्ली हाई कोर्ट के इस मामले ने इस सवाल का जवाब भारतीय कानून के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण दिशा में दिया।
और इसीलिए रमेश्वरी फोटोकॉपी केस भारतीय कॉपीराइट कानून और शिक्षा के अधिकार के इतिहास में एक उल्लेखनीय मामला बन गया।


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