संघर्ष, धैर्य और आत्मविश्वास की मिसाल थीं छत्तीसगढ़ की लोक कलाकार सोनाबाई रजवार। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि कठिन से कठिन परिस्थितियाँ भी किसी इंसान के सपनों और प्रतिभा को कैद नहीं कर सकतीं। 15 वर्षों तक एक कमरे में बंद रहने के बावजूद उन्होंने मिट्टी को अपना साथी बनाया और ऐसी अनूठी कला विकसित की, जिसने उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई।
कम उम्र में हुई शादी, जीवन बन गया संघर्ष
छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के पुहपुत्रा गांव की रहने वाली सोनाबाई रजवार की शादी महज 14 वर्ष की उम्र में होलिराम रजवार से कर दी गई थी। विवाह के बाद वे अपने पति के साथ जंगलों से घिरे एक अलग-थलग घर में रहने लगीं। बताया जाता है कि उनके पति ने उन पर घर से बाहर निकलने की सख्त पाबंदी लगा दी थी और वे अपने छोटे बेटे के साथ वर्षों तक एक कमरे में ही रहने को मजबूर रहीं।
अकेलेपन में मिट्टी बनी सहारा
जहाँ अधिकांश लोग ऐसी परिस्थितियों में टूट जाते, वहीं सोनाबाई ने अपने अकेलेपन को रचनात्मकता में बदल दिया। कमरे की दीवारों और फर्श से मिट्टी निकालकर उन्होंने अपने बेटे के लिए छोटे-छोटे खिलौने और आकृतियाँ बनानी शुरू कीं। धीरे-धीरे यही साधारण प्रयास उनकी अनूठी कला शैली में बदल गया। उनकी मिट्टी की मूर्तियाँ प्रकृति, पशु-पक्षियों, पेड़-पौधों और ग्रामीण जीवन की सुंदर झलक प्रस्तुत करती थीं।
1983 में मिली नई पहचान
सोनाबाई के जीवन में बड़ा बदलाव वर्ष 1983 में आया, जब भोपाल के भारत भवन के शोधकर्ताओं की एक टीम उनके गांव पहुँची। उनकी कला को देखकर सभी प्रभावित हो गए। इसके बाद उनकी कृतियों को देश-विदेश में प्रदर्शित किया जाने लगा। भारत के अलावा अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में भी उनकी कला की प्रदर्शनी आयोजित हुई, जहाँ उनकी रचनाओं को खूब सराहा गया।
सम्मान और उपलब्धियाँ
सोनाबाई रजवार की अनूठी लोक कला के लिए उन्हें कई प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त हुए। मध्य प्रदेश सरकार ने उन्हें तुलसी सम्मान से सम्मानित किया, वहीं कला के क्षेत्र में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्रदान किया गया। उनकी कला ने भारतीय लोक परंपरा को वैशिक मंच पर नई पहचान दिलाई।
77 वर्ष की आयु में हुआ निधन
वर्ष 2007 में 77 वर्ष की आयु में सोनाबाई रजवार का निधन हो गया। हालांकि वे आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी मिट्टी की कला और संघर्ष की कहानी आज भी लाखों लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है। छत्तीसगढ़ में उन्हें समकालीन लोक कला की अग्रणी कलाकारों में गिना जाता है।
प्रेरणा देने वाली विरासत
सोनाबाई रजवार की कहानी हमें सिखाती है कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, यदि इंसान के भीतर हिम्मत, धैर्य और कुछ नया करने का जुनून हो, तो वह अपनी पहचान स्वयं बना सकता है। उन्होंने मिट्टी के छोटे-छोटे खिलौनों से शुरुआत की और अपनी कला के दम पर पूरी दुनिया में सम्मान प्राप्त किया।
सोनाबाई रजवार का जीवन इस बात का जीवंत उदाहरण है कि प्रतिभा को कभी भी कैद नहीं किया जा सकता। दृढ़ इच्छाशक्ति और निरंतर प्रयास इंसान को साधारण से असाधारण बना देते हैं।


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