इस साल जामुन खूब फला है, लगता है सूखा पड़ेगा!"लोकमान्यता, विज्ञान और बदलती जलवायु के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण पड़ताल


ग्रामीण भारत में यह वाक्य अक्सर सुनने को मिल जाता है। हाल के दिनों में सोशल मीडिया पर भी एक दावा तेजी से वायरल हुआ है कि यदि किसी वर्ष जामुन (Syzygium cumini) के पेड़ों पर असाधारण रूप से अधिक फल लग जाएं, तो आने वाले समय में सूखा पड़ने की संभावना बढ़ जाती है। कई लोग इसे प्रकृति की पूर्व चेतावनी मानते हैं, जबकि कुछ इसे किसानों के पारंपरिक अनुभवों से जोड़ते हैं।
लेकिन क्या वास्तव में जामुन का पेड़ भविष्य में पड़ने वाले सूखे की भविष्यवाणी कर सकता है? क्या इसके पीछे कोई वैज्ञानिक आधार है या यह केवल एक लोकविश्वास है? आइए इस विषय को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझने का प्रयास करें।

प्रकृति के संकेतों पर आधारित लोकमान्यता

भारत सहित दुनिया के अनेक देशों में किसानों ने सदियों से मौसम का अनुमान लगाने के लिए प्राकृतिक संकेतों का सहारा लिया है। पक्षियों के व्यवहार, चींटियों की गतिविधियों, हवा की दिशा, बादलों के स्वरूप तथा वृक्षों के पुष्पन एवं फलन को मौसम से जोड़कर देखा जाता रहा है।
इसी क्रम में यह मान्यता भी विकसित हुई कि यदि जामुन, महुआ, बेर या कुछ अन्य वृक्षों पर अत्यधिक फलन हो, तो भविष्य में वर्षा कम हो सकती है या सूखे जैसी स्थिति बन सकती है। कई बुजुर्गों का मानना है कि प्रकृति पहले से कठिन परिस्थितियों का आभास कर लेती है और वृक्ष अधिक बीज उत्पन्न करके अपनी प्रजाति को सुरक्षित रखने का प्रयास करते हैं।
यह विचार रोचक अवश्य है, लेकिन वैज्ञानिक परीक्षण की कसौटी पर इसकी जांच आवश्यक है।

विज्ञान क्या कहता है?

आधुनिक कृषि मौसम विज्ञान (Agrometeorology), पादप शरीर क्रिया विज्ञान (Plant Physiology) तथा जलवायु विज्ञान (Climate Science) के अनुसार अब तक ऐसा कोई वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है जो यह सिद्ध कर सके कि जामुन का वृक्ष भविष्य में पड़ने वाले सूखे की सटीक भविष्यवाणी कर सकता है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि पेड़ भविष्य की घटनाओं को नहीं जानते, बल्कि वे वर्तमान तथा पिछले वर्षों की पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुसार प्रतिक्रिया करते हैं। इसलिए किसी वर्ष अधिक फल लगना भविष्य के मौसम का संकेत नहीं, बल्कि पिछले मौसमीय कारकों का परिणाम होता है।
दूसरे शब्दों में, जामुन का भरपूर फलन "भविष्य का पूर्वानुमान" नहीं बल्कि "अतीत की परिस्थितियों का प्रतिबिंब" है।

जामुन में अधिक फलन किन कारणों से होता है?

जामुन के वृक्षों में फलन अनेक जैविक एवं पर्यावरणीय कारकों से प्रभावित होता है।

1. अनुकूल तापमान और मौसम: यदि फूल बनने से पहले का मौसम अपेक्षाकृत ठंडा एवं शुष्क हो तथा पुष्पन के दौरान अत्यधिक वर्षा या तेज हवाएं न चलें, तो फल बनने की संभावना बढ़ जाती है।

2. पूर्व वर्ष में पर्याप्त वर्षा: जब पिछले वर्ष मिट्टी में पर्याप्त नमी उपलब्ध रहती है और वृक्ष स्वस्थ वृद्धि करता है, तो अगले मौसम में वह अधिक पुष्प और फल उत्पन्न कर सकता है।

3. वृक्ष का स्वास्थ्य: स्वस्थ, रोगमुक्त तथा परिपक्व वृक्ष सामान्यतः अधिक फल देते हैं। उचित पोषण और बेहतर जड़ विकास भी फलन को प्रभावित करते हैं।

4. परागण की सफलता: मधुमक्खियों और अन्य परागणकर्ताओं की सक्रियता जितनी अधिक होगी, फल बनने की दर भी उतनी ही अधिक होगी।

5. "मास्ट फ्रूटिंग" की प्राकृतिक प्रक्रिया: वनस्पति विज्ञान में "मास्ट फ्रूटिंग" एक प्रसिद्ध घटना है, जिसमें कुछ वृक्ष एक या दो वर्षों के अंतराल पर असाधारण मात्रा में फल और बीज उत्पन्न करते हैं। यह एक प्राकृतिक जैविक रणनीति है जिससे अधिक संख्या में बीज जीवित रह सकें।

फिर यह धारणा बनी कैसे?

इस प्रश्न का उत्तर मानव मनोविज्ञान में छिपा है। मान लीजिए किसी वर्ष जामुन की भरपूर पैदावार हुई और अगले वर्ष वर्षा कम हो गई। ऐसी घटनाएं लोगों की स्मृति में लंबे समय तक बनी रहती हैं। लेकिन जिन वर्षों में जामुन अधिक फला और उसके बाद सामान्य या अच्छी वर्षा हुई, वे घटनाएं धीरे-धीरे भुला दी जाती हैं। मनोविज्ञान में इसे "Confirmation Bias" कहा जाता है, जिसमें व्यक्ति उन्हीं घटनाओं को याद रखता है जो उसकी पहले से बनी मान्यता का समर्थन करती हैं।

क्या पेड़ मौसम के प्रति संवेदनशील होते हैं?

निश्चित रूप से होते हैं। वृक्ष अपने आसपास के पर्यावरणीय परिवर्तनों के प्रति अत्यंत संवेदनशील होते हैं। उनका विकास और फलन निम्नलिखित कारकों से प्रभावित होता है—
• मिट्टी की नमी
• तापमान
• वायुमंडलीय आर्द्रता
• दिन की अवधि (Photoperiod)
• जल तनाव (Water Stress)
• कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर
• पोषक तत्वों की उपलब्धता
लेकिन यह संवेदनशीलता वर्तमान या हाल की परिस्थितियों तक सीमित होती है। इसके आधार पर भविष्य के सूखे की सटीक भविष्यवाणी नहीं की जा सकती।

जलवायु परिवर्तन और जामुन का बदलता व्यवहार

वर्ष 2025 और 2026 वैश्विक तापमान के लिहाज से सबसे गर्म वर्षों में गिने जा रहे हैं। जलवायु वैज्ञानिकों के अनुसार पिछले दशक में पृथ्वी का औसत तापमान औद्योगिक काल से लगभग 1.5°C अधिक स्तर तक पहुंच चुका है।

भारत में भी मौसम की चरम घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं—
• लंबे शुष्क अंतराल
• अनियमित मानसून
• अचानक अत्यधिक वर्षा
• तीव्र हीट वेव
• गर्म रातों की बढ़ती संख्या
इन परिवर्तनों का प्रभाव वृक्षों के पुष्पन और फलन चक्र पर भी पड़ रहा है। कई क्षेत्रों में जामुन के वृक्ष सामान्य से अधिक फल दे रहे हैं, जबकि कुछ क्षेत्रों में उत्पादन घट रहा है। वैज्ञानिक इसे स्थानीय जलवायु, तापमान, नमी तथा पारिस्थितिक परिस्थितियों से जोड़ते हैं, न कि भविष्य के सूखे की भविष्यवाणी से।

क्या पारंपरिक ज्ञान का कोई महत्व नहीं?

ऐसा बिल्कुल नहीं है। भारतीय किसानों का पारंपरिक ज्ञान सदियों के अनुभवों का परिणाम है और उसमें कई महत्वपूर्ण पर्यावरणीय अवलोकन शामिल हैं। अनेक बार स्थानीय जैविक संकेत मौसम के अल्पकालिक रुझानों को समझने में सहायक हो सकते हैं। लेकिन आज की तेजी से बदलती जलवायु में केवल पारंपरिक संकेतों के आधार पर कृषि निर्णय लेना जोखिमपूर्ण हो सकता है। इसलिए स्थानीय अनुभवों को आधुनिक वैज्ञानिक जानकारी और मौसम पूर्वानुमान के साथ जोड़कर देखना अधिक उचित होगा।

किसानों के लिए क्या है सही रणनीति?

यदि किसी वर्ष जामुन के पेड़ों पर अत्यधिक फल दिखाई दें, तो इसे सूखे की निश्चित चेतावनी मानने की आवश्यकता नहीं है।
किसानों को चाहिए कि वे—
• भारतीय मौसम विभाग (IMD) के पूर्वानुमानों पर नियमित नजर रखें।
• वर्षा जल संचयन को बढ़ावा दें।
• खेतों में नमी संरक्षण तकनीकों का उपयोग करें।
• सूखा सहनशील फसल किस्मों को अपनाएं।
• कृषि विविधीकरण करें।
• मौसम आधारित कृषि सलाह का पालन करें।
• जलवायु-स्मार्ट कृषि तकनीकों को अपनाएं।

अंत में

जामुन के पेड़ों पर अत्यधिक फल लगना निस्संदेह एक रोचक प्राकृतिक घटना है, लेकिन वर्तमान वैज्ञानिक प्रमाण यह नहीं बताते कि यह भविष्य में पड़ने वाले सूखे की विश्वसनीय भविष्यवाणी कर सकता है। अधिक फलन मुख्यतः वृक्ष के स्वास्थ्य, पूर्व वर्ष की वर्षा, तापमान, नमी तथा अन्य जैविक प्रक्रियाओं का परिणाम होता है।
लोकज्ञान का सम्मान करना आवश्यक है, लेकिन कृषि और मौसम संबंधी निर्णय वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित होने चाहिए। प्रकृति हमें अनेक संकेत अवश्य देती है, परंतु भविष्य के मानसून या सूखे का सबसे विश्वसनीय आकलन आधुनिक मौसम विज्ञान, उपग्रह आधारित निगरानी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित मॉडल और वैज्ञानिक विश्लेषण ही कर सकते हैं।

इसलिए यदि इस वर्ष जामुन के पेड़ों पर फल अधिक दिखें, तो उसे आगामी सूखे की निश्चित चेतावनी नहीं, बल्कि प्रकृति की एक सामान्य जैविक प्रतिक्रिया के रूप में देखना अधिक वैज्ञानिक और तर्कसंगत होगा।

– प्रोफेसर (डॉ.) एस.के. सिंह
विभागाध्यक्ष, पोस्ट ग्रेजुएट डिपार्टमेंट ऑफ प्लांट पैथोलॉजी एवं नेमेटोलॉजी, प्रधान (अतिरिक्त प्रभार), केला अनुसंधान संस्थान, गोरौल, हाजीपुर; पूर्व प्रधान अन्वेषक, अखिल भारतीय फल अनुसंधान परियोजना एवं पूर्व सह निदेशक अनुसंधान, डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा, समस्तीपुर, बिहार
संपर्क: sksraupusa@gmail.com / sksingh@rpcau.ac.in 

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