पीयूष मिश्रा की कहानी: फुटपाथ की उस रात से ‘आरंभ है प्रचंड’ तक, और उस लड़ाई तक जिसे दुनिया ने बहुत देर से देखा

जिस आदमी ने अपना नाम “अमृत” रखा, वह बीस साल शराब से लड़ता रहा

मुंबई का एक फुटपाथ।

सुबह एक नौजवान की आंख खुली।

रात को जिस आदमी की चादर में घुसकर वह सोया था, वह आदमी रात में ही मर चुका था।

नौजवान ने आंखें खोलीं। सामने मौत थी।

वह उठा और वहां से भाग गया।

कई साल बाद उसने यह किस्सा मंच से सुनाया। बताया कि आज भी मुंबई के उस इलाके से गुजरता है तो सड़क की तरफ देखने से बचता है। उस रात की याद उसके भीतर कहीं अब भी जिंदा है।

उस नौजवान का नाम था—पीयूष मिश्रा।

लेकिन हमेशा से नहीं।

पंद्रह-सोलह साल की उम्र में उसने अदालत में हलफनामा देकर अपना नाम बदल लिया था।

जन्म का नाम था—प्रियकांत शर्मा।

नया नाम चुना—पीयूष मिश्रा।

पीयूष।

यानी अमृत।

शायद उस उम्र में उसे खुद नहीं पता था कि जिंदगी उसे किस तरह के जहर से लड़ाने वाली है।

जिस आदमी ने अपने लिए अमृत नाम चुना, वही आदमी करीब दो दशक तक एक गिलास के सामने हारता रहा।

और फिर उसी आदमी ने एक दिन उस गिलास से आंख मिलाई।

यह कहानी फिल्मों की नहीं है।

हालांकि इसमें गुलाल है।

गैंग्स ऑफ वासेपुर है।

मकबूल है।

‘आरंभ है प्रचंड’ है।

‘हुस्ना’ है।

थिएटर है।

कविताएं हैं।

तालियां हैं।

लेकिन इन सबके पीछे एक और कहानी है।

एक ऐसे आदमी की, जिसने पहले अपने बचपन से लड़ाई की, फिर अपने गुस्से से, फिर शराब से और आखिर में खुद से।


ग्वालियर का वह बच्चा

13 जनवरी 1963।

ग्वालियर।

घर में आर्थिक तंगी थी। हालात ऐसे हुए कि परिवार को पिता की बड़ी बहन के घर जाकर रहना पड़ा। बुआ तारादेवी मिश्रा की अपनी संतान नहीं थी। उन्होंने इस बच्चे को गोद ले लिया।

घर बुआ का था।

हुक्म भी उनका था।

पीयूष ने अपने बचपन को बहुत खुशहाल बचपन की तरह याद नहीं किया। इंटरव्यू में उन्होंने अपने आपको एक चुप, शर्मीले और दबे हुए बच्चे के रूप में याद किया है।

स्कूल में भी दबाव।

घर में भी दबाव।

और भीतर बहुत कुछ ऐसा, जिसके लिए शब्द नहीं थे।

कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ाया गया।

विज्ञान समझ नहीं आता था।

फिजिक्स-केमिस्ट्री से ज्यादा दिल नंदन और चंपक में लगता था।

एक बार उन्होंने मजाकिया अंदाज में बताया कि मेंढक काटकर उसकी चीरफाड़ करने को कहा गया तो उन्होंने साफ मना कर दिया—उसे दर्द होगा।

यह छोटी-सी बात शायद उनके स्वभाव की एक झलक थी।

दूसरे के दर्द को महसूस करने वाला बच्चा।

लेकिन अपने दर्द के बारे में बोलने की जगह उसके पास बहुत कम थी।

आठवीं में पहली कविता लिखी।

दसवीं के आसपास उन्होंने अपना नाम बदलने का फैसला किया।

उपलब्ध पुराने इंटरव्यू के मुताबिक, उन्होंने जिला अदालत में हलफनामा देकर प्रियकांत शर्मा से पीयूष मिश्रा नाम अपना लिया। उनके लिए यह सिर्फ नाम बदलना नहीं था; वह अपने पुराने जीवन से दूरी बनाने की कोशिश भी थी।

लेकिन कहानी का सबसे कठिन हिस्सा अभी बाकी था।


एक ऐसा जख्म, जिसके बारे में उन्होंने पचास साल बाद बताया

सातवीं कक्षा।

उम्र बहुत कम।

एक महिला रिश्तेदार ने उनका यौन शोषण किया।

इस घटना के बारे में पीयूष मिश्रा ने लगभग पांच दशक बाद, 2023 में अपनी आत्मकथात्मक पुस्तक तुम्हारी औकात क्या है पीयूष मिश्रा में लिखा और बाद में इसके बारे में सार्वजनिक रूप से बात भी की। उन्होंने बताया कि उस घटना को लंबे समय तक भीतर दबाए रखा और किताब में नाम बदलने का फैसला इसलिए किया क्योंकि उनका उद्देश्य किसी से बदला लेना नहीं था।

बचपन की ऐसी घटनाएं अक्सर खत्म नहीं होतीं।

वे सिर्फ दिखाई देना बंद कर देती हैं।

कभी गुस्से के रूप में लौटती हैं।

कभी डर बनकर।

कभी आत्मविश्वास की कमी बनकर।

कभी रिश्तों में।

और कभी किसी ऐसी चीज में, जो कुछ देर के लिए भीतर का शोर बंद कर दे।

पीयूष मिश्रा के मामले में वह रास्ता आगे चलकर शराब तक गया।

लेकिन उससे पहले उन्होंने उस गुस्से को कला में बदला।


गुस्सा मंच पर आया

1983।

दिल्ली का नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा।

उन्होंने परीक्षा दी।

कहा जाता है कि मकसद सिर्फ पढ़ाई नहीं था।

ग्वालियर से निकलना भी था।

NSD में आने के बाद उनकी मुलाकात जर्मन निर्देशक फ्रिट्ज बेनेविट्ज से हुई।

और फिर उन्हें मिला—हैमलेट।

वह किरदार जो पिता की हत्या के बाद भीतर ही भीतर जलता रहता है।

बदला।

गुस्सा।

उलझन।

अकेलापन।

शायद इसलिए पीयूष के भीतर का कलाकार उस किरदार से इतनी गहराई से जुड़ गया।

NSD में उनका नाम ही पड़ गया—हैमलेट।

इसके बाद दिल्ली का थिएटर उनका घर बन गया।

एक्ट वन थिएटर ग्रुप।

मनोज बाजपेयी जैसे साथी।

‘गगन दमामा बाज्यो।’

भगत सिंह।

कविताएं।

नाटक।

रिहर्सल।

मंडी हाउस।

बीस साल का वह दौर, जिसे पीयूष आज भी अपने जीवन के सबसे रचनात्मक समयों में गिनते हैं। उन्होंने हाल के एक इंटरव्यू में कहा कि दिल्ली में किए गए उस काम की वजह से ही वे आगे चलकर वह बन पाए जो बने।

यहीं उनकी मुलाकात हुई प्रिया नारायणन से।

1992।

स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर में एक नाटक के सिलसिले में पहुंचे थे।

प्रिया वहां पढ़ती थीं।

मुलाकात हुई।

इश्क हुआ।

1992 से 1995 तक दोनों ने एक-दूसरे को जाना।

फिर शादी।

आज पीयूष अपनी जिंदगी में प्रिया की भूमिका को बेहद महत्वपूर्ण मानते हैं। 2026 में उन्होंने खुद बताया कि दोनों ने 1992 से 1995 तक डेट किया और फिर शादी की।

लेकिन उसी समय उनकी जिंदगी में एक और चीज गहराती जा रही थी।

शराब।


शौक कब बीमारी बन गया, पता ही नहीं चला

पीयूष के मुताबिक, शराब उनके जीवन में पहले शौक की तरह आई।

फिर आदत बनी।

और धीरे-धीरे ऐसी जरूरत बन गई, जिसके बिना शरीर और दिमाग बेचैन होने लगे।

उन्होंने बाद में कहा कि एक समय ऐसा आता है जब आदमी को लगता है कि उसे पीना ही पड़ेगा। इच्छा से ज्यादा शरीर की मांग महत्वपूर्ण हो जाती है।

यही लत की खतरनाक जगह है।

क्योंकि बाहर से देखने वाला कहता है—

“छोड़ क्यों नहीं देता?”

लेकिन अंदर से आदमी पूछ रहा होता है—

“छोड़ना चाहकर भी छोड़ क्यों नहीं पा रहा?”

पीयूष ने अपने बारे में इससे भी कठोर बातें खुद कही हैं।

उन्होंने बताया कि शराब ने उनके रिश्तों को चोट पहुंचाई। मां से ऐसी बातें कहीं जिनका उन्हें बाद में अफसोस हुआ। नशे में ऐसी हरकतें कीं जिन्हें अगले दिन याद करके उन्हें लगता था—“ये मैं कैसे कर सकता था?”

2026 में एक पॉडकास्ट बातचीत में उन्होंने बताया कि नशे की हालत में उन्होंने महिलाओं को अनुचित और अश्लील फोन कॉल भी किए और अगले दिन कई बार उन्हें याद तक नहीं रहता था। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि इस व्यवहार का असर उनके पेशेवर रिश्तों पर पड़ा और कुछ लोग उनके साथ काम करने से डरने लगे थे।

लेकिन एक बात वह बार-बार कहते रहे हैं—

उन्होंने सेट पर शराब पीकर काम नहीं किया।

फिर भी शराब उनके दिमाग पर सवार रहती थी।

यानी शरीर शूटिंग पर था।

दिमाग कहीं और।

और यही किसी भी लत की भयावहता है।


13 सितंबर 1995

यह तारीख उनकी जिंदगी में दो मौतें लेकर आई।

एक तरफ उनके गुरु और निर्देशक फ्रिट्ज बेनेविट्ज की मौत।

दूसरी तरफ उनके पिता की मौत।

जिस आदमी ने मंच पर ‘हैमलेट’ बनकर पिता की मौत का दुख जिया था, अब वही दुख उसके सामने असल जिंदगी में खड़ा था।

और उसी दौर में शराब का रिश्ता भी और गहरा होता चला गया।

पीयूष ने बाद में बताया कि रातें शराब के साथ गुजरने लगी थीं।

अकेले।

चुपचाप।

धीरे-धीरे।

कारवां के पुराने प्रोफाइल में उनके जीवन के इस दौर, थिएटर, परिवार और शराब के बढ़ते असर का विस्तृत वर्णन मिलता है।

शायद यही वह समय था जब भीतर का पुराना गुस्सा और बोतल एक-दूसरे के साथी बन गए।

वह खुद कहते रहे हैं कि उनके जीवन में जो कुछ बना, उसमें उस गुस्से की भूमिका थी।

और जो कुछ बिगड़ा, उसमें भी।


मुंबई ने पहले उन्हें जगह नहीं दी

1999 में उन्होंने अकेले मंच पर एक शो किया।

करीब बीस गाने।

कोई तय स्क्रिप्ट नहीं।

नाम था—

‘हैमलेट कभी बंबई नहीं गया।’

कुछ साल बाद हैमलेट सच में बंबई चला गया।

2002 के आसपास।

मुंबई में संघर्ष आसान नहीं था।

काम की तलाश।

पैसे की कमी।

रहने की जगह का संकट।

और फिर वह फुटपाथ।

दादर का फुटपाथ।

एक तरफ पटरी।

दूसरी तरफ सड़क।

रात गुजारने के लिए पैसे देने पड़ते थे।

एक आदमी था जो स्मैक लेता था।

उसके पास एक चादर थी।

एक रात दोनों उसी चादर में सो गए।

सुबह पीयूष की आंख खुली तो वह आदमी मर चुका था।

वह पूरी रात एक लाश के साथ सोते रहे थे।

कल्पना कीजिए—

आज जिसे हजारों लोग मंच पर सुनने के लिए टिकट खरीदते हैं, वह कभी रात गुजारने के लिए फुटपाथ पर जगह खरीद रहा था।

आज जिसके गीतों पर लोग तालियां बजाते हैं, वह कभी सुबह उठकर मौत से भागा था।

लेकिन यही जिंदगी है।

कभी मंच।

कभी फुटपाथ।

कभी तालियां।

कभी तिरस्कार।


2005 — पहली बार मदद मांगना

शराब अब सिर्फ आदत नहीं रही थी।

पीयूष ने बाद में बताया कि करीब 2005 में उन्हें समझ आया कि मामला गंभीर है और उन्होंने मदद लेने की कोशिश की।

2019 में नील;श मिश्रा के साथ लंबी बातचीत में उन्होंने कहा था कि शराब ने उनके जीवन को तबाह कर दिया था और अगर उस समय उन्होंने मदद नहीं ली होती तो शायद 2009-10 तक जिंदा रहना भी मुश्किल होता।

यहां एक बात बहुत महत्वपूर्ण है।

मदद मांगना कमजोरी नहीं था।

बल्कि शायद पहली बार उन्होंने स्वीकार किया था कि अकेले लड़ना पर्याप्त नहीं है।


2009 — शरीर ने खतरे की घंटी बजा दी

फिर आया 2009।

गुलाल रिलीज हुई।

पीयूष मिश्रा की आवाज।

उनके गीत।

उनका संगीत।

और—

‘आरंभ है प्रचंड।’

एक ऐसा गीत जो आज भी हजारों लोगों के भीतर ऊर्जा पैदा करता है।

लेकिन उसी दौर में जिंदगी ने पीयूष को एक बड़ा झटका दिया।

अमेरिका जाते समय उन्हें ब्रेन स्ट्रोक हुआ।

शरीर के दाहिने हिस्से पर असर पड़ा।

उन्होंने इस घटना को अपने जीवन का बड़ा मोड़ बताया है।

जिस शरीर को वह वर्षों से नजरअंदाज कर रहे थे, उसने आखिरकार जवाब दे दिया।

यह सिर्फ मेडिकल घटना नहीं थी।

यह चेतावनी थी।

पीयूष ने बाद में कहा कि इसी दौर ने उन्हें अपनी शराब की समस्या को ज्यादा गंभीरता से देखने के लिए मजबूर किया।

उन्हें समझ आया—

अगर यही चलता रहा तो एक दिन जिंदगी खत्म हो सकती है।


इगतपुरी — और भीतर की तरफ लौटना

2010।

महाराष्ट्र का इगतपुरी।

विपश्यना।

कई दिन तक चुप रहना।

बाहर की दुनिया से दूरी।

और पहली बार शायद उस आदमी का अपने भीतर बैठना, जो पूरी जिंदगी बाहर की दुनिया से लड़ता रहा था।

पीयूष के मुताबिक, विपश्यना और आध्यात्मिक अभ्यास से उनकी शराब की तलब कम होने लगी।

उन्होंने बाद के इंटरव्यू में भी बताया कि 2009 के स्ट्रोक के बाद उन्होंने विपश्यना शुरू की और इससे उन्हें क्रेविंग पर नियंत्रण पाने में मदद मिली।

यह उनका व्यक्तिगत अनुभव है।

इसे किसी दूसरे व्यक्ति के लिए शराब की लत का इलाज नहीं समझना चाहिए।

शराब पर निर्भरता एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या हो सकती है और लंबे समय से शराब पी रहे व्यक्ति के लिए अचानक शराब बंद करना खतरनाक भी हो सकता है। ऐसे मामलों में चिकित्सकीय सलाह और उचित उपचार जरूरी है।

पीयूष का रास्ता उनका अपना था।

लेकिन उनकी कहानी से एक बात जरूर सीखी जा सकती है—

कभी-कभी पहला इलाज यह स्वीकार करना होता है कि इलाज चाहिए।


घर बचा, लेकिन आसानी से नहीं

पीयूष मिश्रा की जिंदगी में शराब ने सिर्फ उनके शरीर को नुकसान नहीं पहुंचाया।

रिश्तों को भी चोट लगी।

उन्होंने अपनी पत्नी प्रिया को अपने कठिन दौर में बहुत कुछ सहने के लिए मजबूर किया—यह बात पीयूष खुद स्वीकार कर चुके हैं। एक पुराने इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि उनकी पत्नी ने उनके शराब से जुड़े बुरे दौर में बहुत साथ दिया।

2025-26 में उन्होंने अपनी शादी और रिश्ते के बारे में कई निजी बातें भी सार्वजनिक कीं।

उन्होंने बताया कि शादी के वर्षों बाद उन्हें यह समझने में समय लगा कि प्रिया सिर्फ उनकी साथी नहीं, उनकी पत्नी और जीवनसाथी हैं।

एक समय उन्होंने अपने पुराने व्यवहार और गलतियों के बारे में उनसे खुलकर बात की।

दोनों रोए।

गले मिले।

और बात खत्म करने का फैसला किया।

आज जब पीयूष अपनी पत्नी की बात करते हैं तो उसमें एक बात बार-बार आती है—

कृतज्ञता।

वह मानते हैं कि प्रिया ने उन्हें बहुत संभाला।

और जिस महिला ने उनके साथ संघर्ष के दिनों में कदम मिलाया, वही बाद में उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी।


सबसे बड़ी जीत: बच्चों पर अपना सपना नहीं थोपा

पीयूष और प्रिया के दो बेटे हैं।

दोनों ने अपनी-अपनी राह चुनी।

किसी ने पिता की तरह कला को अपना पेशा नहीं बनाया।

और पीयूष को इससे कोई शिकायत नहीं।

बल्कि उन्होंने इसके पीछे एक बेहद महत्वपूर्ण बात कही—

अगर उन्हें कला पसंद नहीं है तो वे कला में क्यों जाएं?

शायद यहीं उनकी कहानी का एक सबसे खूबसूरत मोड़ छिपा है।

जिस बच्चे का बचपन दूसरों की इच्छाओं और फैसलों के बीच बीता था, उसने अपने बच्चों को अपनी इच्छाओं का विस्तार नहीं बनाया।

उन्होंने यह समझा कि बच्चा किसी माता-पिता की अधूरी महत्वाकांक्षा पूरा करने के लिए पैदा नहीं होता।

हर बच्चा अलग है।

हर बच्चे की अपनी जिंदगी है।

और शायद यही वह जगह है जहां पीढ़ियों से चल रहा दबाव रुकता है।


‘संताप’ से ‘अमृत’ तक

2023 में उनकी किताब आई—

‘तुम्हारी औकात क्या है पीयूष मिश्रा।’

यह पूरी तरह सीधी-सादी आत्मकथा नहीं थी।

उन्होंने इसे उपन्यास की शक्ल दी।

घटनाएं वास्तविक जीवन से ली गईं, लेकिन कई नाम बदले गए।

किताब के नायक का नाम है—

संताप त्रिवेदी।

संताप।

यानी भीतर की जलन।

सोचिए—

एक लड़का जिसने पंद्रह साल की उम्र में अपना नाम बदलकर पीयूष चुना था।

अमृत।

और साठ की उम्र के करीब पहुंचकर उसी ने अपनी कहानी के नायक का नाम रखा—

संताप।

शायद पूरी जिंदगी इन्हीं दो शब्दों के बीच चली।

अमृत और संताप।

एक तरफ कुछ बना लेने की जिद।

दूसरी तरफ भीतर जलते रहने की कीमत।


और फिर आया ‘आरंभ’

आज पीयूष मिश्रा सिर्फ अभिनेता नहीं हैं।

वह मंच पर गाते हैं।

कविताएं सुनाते हैं।

अपने बैंड Ballimaaraan के साथ देश-विदेश में कार्यक्रम करते हैं।

बैंड का नाम दिल्ली के उस इलाके से लिया गया है जो मिर्जा गालिब से जुड़ा है। पीयूष के इस म्यूजिकल प्रोजेक्ट ने देश के कई शहरों में प्रदर्शन किए हैं और ‘आरंभ है प्रचंड’, ‘हुस्ना’, ‘इक बगल में चांद होगा’ जैसे गीतों को मंच पर नई जिंदगी दी है।

एक समय वह मुंबई में सोने के लिए फुटपाथ तलाश रहे थे।

आज मंच पर उनके सामने हजारों लोग होते हैं।

एक समय उनके पास छत नहीं थी।

आज उनके पास अपना परिवार है।

एक समय वह शराब को अपने जीवन का केंद्र बना चुके थे।

आज वह खुले तौर पर उस दौर की सबसे बड़ी गलती के बारे में बात करते हैं।

और शायद यही वजह है कि उनकी कहानी सिर्फ सफलता की कहानी नहीं है।

यह वापसी की कहानी है।


लेकिन कहानी का सबसे जरूरी हिस्सा अभी बाकी है

2026 में पीयूष मिश्रा ने शराब के साथ अपने पुराने रिश्ते पर फिर खुलकर बात की।

उन्होंने कहा कि उन्होंने शराब पूरी तरह नहीं छोड़ी है। अब कभी-कभार पीते हैं, नियमित रूप से नहीं। उन्होंने यह भी कहा कि क्रेविंग को उन्होंने आध्यात्मिक अभ्यास और विपश्यना के जरिए काफी हद तक नियंत्रित किया है। साथ ही उन्होंने खुद को अब भी शराब की समस्या से जुड़ा व्यक्ति बताया।

अब इस बात को दो तरह से पढ़ा जा सकता है।

पहली तरह—

“अगर पीयूष मिश्रा अभी भी कभी-कभी पीते हैं, तो छोड़ने की जरूरत क्या है?”

यह आधी कहानी है।

दूसरी तरह—

उस आदमी की बात सुनिए जिसने खुद कहा कि शराब उसके जीवन का सबसे बड़ा पछतावा है।

दिसंबर 2025 में उन्होंने अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा पछतावा बताते हुए शराब को सबसे ऊपर रखा। उन्होंने कहा कि अगर शुरुआत में ही इस पर नियंत्रण रखा होता तो जिंदगी में शायद बहुत कुछ और कर पाते।

अब पूरी बात समझ आती है।

लत से बाहर निकलना सिर्फ “मैंने छोड़ दिया” कह देने का नाम नहीं है।

कई लोगों के लिए यह लंबे समय तक चलने वाली निगरानी, उपचार, परिवार के सहयोग और खुद पर लगातार काम करने की प्रक्रिया होती है।

और यही वजह है कि पीयूष की कहानी को जीत या हार के आसान खांचे में रखना ठीक नहीं।

यह एक लगातार चलती हुई लड़ाई है।


“बाद में” — लत का सबसे खतरनाक शब्द

हर लत एक ही दिन में शुरू नहीं होती।

पहले कोई कहता है—

“आज थोड़ा।”

फिर—

“दोस्तों के साथ।”

फिर—

“तनाव बहुत है।”

फिर—

“कल से कम कर दूंगा।”

और आखिर में आता है—

“बाद में छोड़ दूंगा।”

यही “बाद में” कभी-कभी सालों में बदल जाता है।

पीयूष मिश्रा की जिंदगी उस “बाद में” की कीमत दिखाती है।

उन्होंने खुद अपने सबसे बुरे दौर को छिपाया नहीं।

मां को कही कड़वी बातें।

पत्नी को पहुंची तकलीफ।

काम पर पड़ा असर।

नशे में किए गए ऐसे काम जिन्हें याद करके शर्म आई।

ब्रेन स्ट्रोक।

और फिर खुद को संभालने की कोशिश।

2026 की बातचीत में उन्होंने अपने पुराने व्यवहार को याद करते हुए कहा कि शराब के दौर में वह खुद पर नियंत्रण खो चुके थे और बाद में उन्हें एहसास होता था कि उन्होंने ऐसी चीजें कीं जिन्हें सामान्य अवस्था में वे खुद से जोड़ नहीं पाते थे।

यह स्वीकार करना आसान नहीं होता।

लेकिन शायद बदलाव वहीं से शुरू होता है।

जब आदमी बहाना बनाना बंद कर देता है।


इस कहानी में मुझे सबसे खूबसूरत क्या लगता है?

न फुटपाथ।

न फिल्में।

न तालियां।

न ‘आरंभ है प्रचंड।’

सबसे खूबसूरत चीज है—

वापसी की इच्छा।

पीयूष मिश्रा ने अपने जीवन की गलतियों को मिटाया नहीं।

उन्होंने उन्हें छिपाया भी नहीं।

उन्होंने उन्हें शब्द दे दिए।

किताब में।

मंच पर।

इंटरव्यू में।

पत्नी के सामने।

और शायद इसीलिए उनकी कहानी उन लोगों तक पहुंचती है जो खुद भी किसी न किसी लड़ाई में हैं।

हर आदमी का गुस्सा शराब नहीं बनता।

हर शराबी के पीछे बचपन का जख्म हो, यह भी जरूरी नहीं।

लत की वजहें बहुत अलग-अलग हो सकती हैं।

लेकिन एक बात लगभग हर कहानी में साझा है—

मदद मांगने में देर जितनी बढ़ती है, वापसी उतनी कठिन हो सकती है।

इसलिए अगर आपके आसपास कोई व्यक्ति शराब या किसी दूसरी लत से जूझ रहा है, तो सिर्फ यह मत कहिए—

“इच्छाशक्ति रखो।”

कभी यह भी पूछिए—

“मैं तुम्हारे साथ डॉक्टर तक चलूं?”

क्योंकि बीमारी को गाली देने से बीमारी नहीं जाती।

इलाज से जाती है।

सहारे से जाती है।

और कई बार उस एक हाथ से जाती है, जो आदमी के गिरने के बाद भी उसे छोड़ता नहीं।


पीयूष मिश्रा की कहानी का अंतिम वाक्य शायद यही है—

पंद्रह साल की उम्र में एक लड़के ने अपना नाम बदलकर पीयूष रखा था।

अमृत।

जिंदगी ने उसे संताप दिया।

फुटपाथ दिया।

गरीबी दी।

थिएटर दिया।

शराब दी।

गुस्सा दिया।

ब्रेन स्ट्रोक दिया।

रिश्तों में दरारें दीं।

और फिर उसी जिंदगी ने उसे मंच भी दिया।

परिवार भी दिया।

गीत भी दिए।

और सबसे बड़ी चीज—

अपने अतीत को स्वीकार करने की हिम्मत दी।

आज जब वह मंच पर खड़े होकर गाता है—

“आरंभ है प्रचंड…”

तो उस गीत को सिर्फ एक फिल्मी गीत की तरह सुनना मुश्किल है।

क्योंकि उस आवाज में एक ऐसे आदमी की पूरी जिंदगी सुनाई देती है, जिसने कई बार सोचा होगा कि सब खत्म हो गया।

लेकिन हर बार कहीं न कहीं से एक नया आरंभ हुआ।

फुटपाथ की उस रात से मंच की रोशनी तक—
पीयूष मिश्रा की असली कहानी सफलता की नहीं, वापसी की कहानी है।

और शायद जिंदगी की सबसे बड़ी जीत यही है—

गिरने के बाद यह तय करना कि अगली सुबह उठना है।


नोट: इस लेख में पीयूष मिश्रा द्वारा अपने इंटरव्यू/बातचीत में साझा किए गए निजी अनुभवों को उसी संदर्भ में रखा गया है। शराब-निर्भरता और उसके उपचार के संबंध में लेख का चिकित्सकीय निष्कर्ष नहीं है; लंबे समय से शराब पर निर्भर व्यक्ति को बिना चिकित्सकीय सलाह अचानक शराब बंद नहीं करनी चाहिए।

आपके आसपास अगर कोई व्यक्ति किसी लत से वापस लौटा है—तो उसे वापस लाने में सबसे बड़ा हाथ किसका था?

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